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बुधवार, 6 जून 2012

दरख्तों के लम्बे साए


दरख्तों के लम्बे साए
सूरज की किरणों के साथ
अँधेरे के
घूँघट से निकल पड़ते
कभी छोटे कभी लम्बे होते
बहती बयार में
दरख्तों के साथ
खुशी से  झूमते
उन्हें पता है
सूरज के ढलते ही
उन्हें भी अँधेरे में छुपना
पडेगा
डूबते के साथ
उन्हें भी डूबना होगा
अपना
अस्तित्व खोना होगा
जब तक अस्तित्व है
झूम सको
जितना झूम लो
नहीं तो
पछताना होगा

(डा.राजेंद्र तेला"निरंतर")   
06-06-2012
574-24-06-12

3 टिप्‍पणियां:

Markand Dave ने कहा…

जब तक अस्तित्व है
झूम सको
जितना झूम लो
नहीं तो
पछताना होगा

Very Very Very nice said sir..!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी लगाई जा रही है!
सूचनार्थ!

आशा जोगळेकर ने कहा…

प्रकाश में ही साये का अस्तित्व है वरना तो सब अंधकार ।

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