परिकल्पना में आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

सोमवार, 4 जून 2012

कैसे हाँ कहूँ ? जब ना कहना चाहता हूँ ?


कैसे हाँ कहूँ ?
जब ना कहना चाहता हूँ ?
पर ना भी कैसे कहूँ?
समझ नहीं पाता हूँ
झंझावत में फंसा हूँ
रिश्तों के बिगड़ने का खौफ
दुश्मनी मोल लेने का डर
मुझे ना कहने से रोकता है
कैसे उसूलों को तोडूँ
मन को दुखी कर के हाँ कहूँ
दुविधा में फंसा हूँ
क्यों ना एक बार
नम्रता से ना कह दूं
सदा के लिए दुविधा से
मुक्ती पा लूँ
कुछ समय के लिए
लोगों को नाराज़ कर दूं
समय के अंतराल में
सब समझ जायेंगे
आदत समझ कर भूल
जायेंगे
मेरा मन खुश रहेगा
फिर हाँ ना के झंझावत में
नहीं फंसेगा
03-06-2012
557-77-05-12
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"
 (जीवन में अक्सर ऐसी स्थिति आती है जब इंसान ना कहना चाहता है,पर रिश्तों में कडवाहट के डर से घबराता है ,और अनुचित बात के लिए भी हाँ कह कर मन को दुखी करता है)

4 टिप्‍पणियां:

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ठ प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार 5/6/12 को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी |

ब्रजेश सिन्हा ने कहा…

वाह क्या बात है, बहुत ही सुन्दर और मनमोहक प्रस्तुति !

मनोज पाण्डेय ने कहा…

सुन्दर पोस्ट।

Saras ने कहा…

वैसे अगर पहली ही बार में न बोल दें तो ही अच्छा है ...क्योंकि जब न बोलेंगे..बुरे बनेंगे .....फिर इतने संत्रास से गुज़रना क्यों.....

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