चौबे जी की चौपाल 


आज चौबे जी कुछ दिलफेंक मूड में हैं। देश के घटनाक्रम पर अपनी चुटीली टिप्पणी से गुदगुदाते हुए कह रहे हैं कि " का बताएं राम भरोसे,ससुरे गदहे तो गदहे गदहिया भी गाने लगी है राग भैरवी। उमगने लगी है राजपथ पर, करने लगी है टिकट खातिर पैरबी। कवनो कहत हैं कि फलाना पार्टी के वोट मत दिह भईया, काहे कि ऊ फूंक डलिहें इंडिया (F.D.I.) त केहू कहत हैं कि लोक के जोंक बनके चाट जयिहें, मगर लोकपाल ना लईहें केहू ऐतराज करत हैं हांथी के खुराक पर, त केहू साईकिल में लागल टायर-ट्यूब  के सुराख पर। केहू कहत हैं कि आपसी कलह से फूल मा अब पहिले वाली खुशबू नाही रही, त केहू कहत हैं कि बंगाल मा मुंह के बल गिरला से हंसुआ-हथौड़ा में भी पहिले वाली धार नाही रही। केहू लंगोट लगाके शीर्षासन, केहू पद्मासन त केहू गुड़गुडासन करत हएं, एकाराके नए जमाने का नया निर्वाचन कहत हैं यानी कि पांच बारिस तक चोंचले खूब लडौलें चोंच, ढूँढत हउहें आजकल एक-दूसरा में खोंच"

"बाह-बाह चौबे जी महाराज वाह,एकदम्म सटीक बाटे ई चुनावी मौसम कआँखों देखा हाल। वैसे ई देश का इतिहास रहा है चौबे जी कि, जब भी वोट देके जेकरा के प्रतिनिधि के रूप में चुनल गईल, ओकरे खातिर बार-बार आपन सिर धुनल गईल। दलित उत्थान,महिला उत्थान की बात करके जे खुबई उत्पात कईलें ऊ  एक-दुई पोर्टफोलियो इनाम मा पा गईलें।" कहलें राम भरोसे 

चुनाव कबात सुनि के उबियाइल गुलटेनवा के चुप ना रहल गईलकहलें कि "ये बाबा !  अबकी सोचि-समझ के अस बनाबह सरकार,डूबन चाहत हिंद को जो भी लेय उबारजो भी लेय उबार,वही सरकार बनाओ.....उनके पगलाए दो,खुद मत पगलाओ ।"

भारतीय राजनीति का इतिहास उठाके देख लेयो,कबो अईसन हवा नाही बही ई देश मा जवना से ई बात की उम्मीद बंधे कि जनसेवक जनता की किस्मत बदलने में दुबले हो गए,ससुरे जनहित के मुद्दे पहिले भी गौण थे,आज भी गौण है और क़ल भी रहेंगे भावनात्मक मुद्दे उठायेके गंगा नहाए की परंपरा रही है हमरे देश मा। जब भी कवनो जनहित के मुद्दे और घोटाले से जनता का ध्यान उठाना हो, एफ डी आई जईसन तुक्का फेंक देयो, विपक्ष के आत्मकेंद्रित करके हो-हल्ला के बाद ठन्डे बस्ते में डाल देयो न रहेगा कमबख्त बांस ना बाजेगी ससुरी बांसुरी ....... कहलें गजोधर 

इतना सुन के रमजानी मियाँ से नहीं रहा गया । अपनी लंबी दाढ़ी सहलाते हुए कहा कि " मैंने चाहा था और मैं अब भी चाहता हूँ कि चुप रहूँ , न बोलूँ ....एक मोटा सा पर्दा पडा है, उसे रहने दूं ,खिड़की न खोलूँ । लेकिन क्या करूँ यार जिसे दर्द होता है वही कराहता है न ? अमां यार, इस देश की जनता का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि गोरों की गुलामी से तो उसने खून बहाकर छुटकारा पा लिया पर कालों की धन की भूख ने जनता के शरीर को इस कदर खोखला कर दिया है कि इस भ्रष्टाचार रुपी गुलामी से लड़ने की कमबख्त उसमें ताक़त ही नहीं बची

इतना कहके रमजानी मियाँ कुछ ज्यादा सीरियस हो गया और बोला कि "आज़ादी के बाद अफसरशाही ने नेताओं के खाने-कमाने के रास्ते दिखाए। नेताओं ने भ्रष्ट नौकरशाहों पर हाथ रखे । देखते ही देखते ससुरी ऐसी बहार बही कि जिसमें आज़ादी दिलाने वालों के सारे ख़्वाब ही बह गए । हर कदम पर घूस। हर योजना में लूट। हर जगह भाई-भतीजावाद। सही तरीके से काम करने और कराने के सारे रास्ते इस कदर संकरे होते चले गए कि उनपर आगे बढ़ने की अब आसानी से कोई हिम्मत नहीं जुटाता ससुरा। जो जुटाता है वो चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह घिर जाता है। दस बईमान मिलकर एक इमानदार को मिनट भर में भ्रष्ट साबित कर देते हैं मियाँ,चुना लगाके। हैरत तो इसी बात की है कि हर सरकार ससुरी इसे ख़त्म करने के दाबे तो करती है पर वो भाषणों और फाईलों से बाहर नहीं निकलती । लूटने वाले नेता,अफसर और बाबू बेख़ौफ़ तिजोरी भरते रहते हैं ।खुदा जाने कब ख़त्म होगा दोनों हाथों से लूट का यह दौर ? ख़त्म होगा भी या नहीं ? भ्रष्टाचार का ये भस्मासुर कम से कम इंसानों के बस में तो नहीं रहा। हमें तो लगता है कि अब वह दौर आ गया है कि घूस को कानूनन अमली जामा पहना ही दिया जाए...... क्या ख्याल हैराम अंजोर ?"

नाही रमजानी भईया तू कबो गलत ना कह सकत हौ । हमरे समझ से भी घूस को कानूनन अमली जामा पहना ही दिया जाए। काहे कि राजनीति मा घूस और घोटाला हाई प्रोफाईल खेल का नाम है। इस खेल को संवैधानिक दर्जा मिल जाने से ट्रांसफर, पोस्टिंग, प्रमोशन, सेवावृद्धि, प्लॉट आबंटन, भान्जों-भतीजों की नौकरी, एजेंसी आबंटन जईसन काम मा कवनो रिस्क नाही रहेगा । जे बरियार पडेगा ऊ ले-दे के करबा लेगा और जे कमजोर पडेगा ससुरा घास-फूस खाय के सो जाएगा  .....कहलें राम अंजोर 

इतना सुनि के तिरजुगिया की माई से ना रहल गईल,कहली कि पहिले जनसेवा से नेता बनत रहलें ह अब धनसेवा से नेता बनत हैं। यानी जनसेवा आज  सेकेंडरी हो गया है। अईसे में हमरे समझ से धनसेवा के महत्व जादा है जनसेवा से। यानी ठगहार तो सब हैं फिर ठगी को,घूस को और घोटाले को  क़ानून का रूप देने में आपत्ति केकरा होई राम अंजोर ? थोड़ा बहुत अन्ना के ऐतराज होई त किरण दीदी से कहवाके मना लिहल जाई । लोकतंत्र मा रूठल -मनावल के खेल त होते रहेला । का गलत कहत हईं चौबे जी ?

इतना सुनके चौबे जी रोमांचित हो उठे और कहे कि चलो मिलकर गाते हैं ....
"बात करे बडबोले, काम करे अपनापन के, 
आए हैं ठगहार घाट पर निर्वाचन के। 
घाट पर निर्वाचन के, लोक का सिर कतरेंगे- 
टुकडे-टुकडे करके बैलेट बॉक्स भरेंगे  
चौबे जी कबिराय कहे छोडो कुम्भकर्णी झपकी 
खंडित होगा जनादेश न संभले यारो अबकी ।" 
इतना कहकर चौबे जी ने चौपाल अगले शनिवार तक के लिए स्थगित कर दिया

रवीन्द्र प्रभात 

10 comments:

  1. बहुत ही बढ़िया व्यंगत्म्क प्रस्तुति... समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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  2. मस्त चौपाल लगाये चौबे जी। कलिहें रामभरोसे कहत रहेन कि चुनाव सुधार हुई जाय त सब अपने आपै सुधर जाय। का कहत हौ ?

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  3. चकाचक है चौबे जी की चौपाल, आपने तो व्यंग्य को एक नया आयाम, दे दिया है प्रभात ...सचमुच सबसे अलग है यह व्यंग्य !

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  4. Pallavi ने पोस्ट " आए हैं ठगहार घाट पर निर्वाचन के । " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    बहुत ही बढ़िया व्यंगत्म्क प्रस्तुति... समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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  5. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है! आपके ब्लॉग पर अधिक से अधिक पाठक पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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