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बुधवार, 12 मई 2010

ऐसा एहसास ऐसी तपिश हर रोज हमारे घर आए :नवीन कुमार



















अभूत अनुभूति -
इक रोज़ हमारे घर आए
इमरोज़ हमारे घर आए
ऐसा एहसास ऐसी तपिश
हर रोज हमारे घर आए
इमरोज़ हमारे घर आए
ऐसा जूनून
ऐसी कशिश
रोज-रोज हमारे घर आए
इमरोज़ हमारे घर आए.........




नवीन कुमार
पटना

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जब बसंती उमर थी
और मैं पुरवा हवा थी
तब पढ़ी थी मैंने अमृता की कहानियाँ
उन कहानियों से निकलकर
एक अनोखा शक्स
--- इमरोज़

मेरे ख्यालों पे छा गया !
उस ख्याल की तलाश में ...
हम नदी ,पहाड़,
पतझड़, बहार
शहर, बियाबान से गुज़र गए
कि अचानक एक दिन
किताबों के मेले में
मेरा ख्याल
जो रेखाओं में था
नज्मों और गीतों में था
हुआ यूँ रूबरू मेरे
ऐसा तो सोचा न था !


मंजुश्री,
पटना

...............
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इस परिचर्चा को हम आगे बढ़ाएंगे एक अल्प विराम के बाद उससे पहले आईये चलते हैं कार्यक्रम स्थल की ओर जहां श्रीमती निर्मला कपिला उपस्थित हैं अपनी कहानी बेटियों की माँ के साथ .....यहाँ किलिक करें
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जारी है उत्सव मिलते हैं एक अल्प विराम के बाद

1 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

इसे कहते हैं प्यार का जादू , सबने इसको स्याही बना कलम की तक़दीर बदल दी है, प्यार से सराबोर है उत्सव

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