एक ऐसी ई-पत्रिका जिसमें  आप साहित्य ,संस्कृति और सरोकार से एकसाथ रूबरू होते हैं . जहां आपकी सदिच्छा के अनुरूप सामग्रियां मिलती है. जो आपकी सृजनात्कता को पूरे विश्व की सृजनात्मकता से जोड़ने को सदैब प्रतिबद्ध रहती है.              अपनी रचनाएँ इस ई-मेल पर भेजें :
परिकल्पना पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

लेखकों से अनुरोध

परिकल्पना पर लिखने वाले लेखकों से अनुरोध है कि जो भी पोस्ट यहाँ पर लिखें,विस्तृत हो,सारगर्भित हो। अपने ब्लॉग पर प्रकाशित पोस्ट का लिंक यहाँ ना लगाएँ,ऐसा करने पर मजबूरन उन्हें हटाना पड़ेगा।

बुधवार, 19 मई 2010

चित्रकार को भी कई मुकाम से गुजरना पड़ता है : डा. डी. डी. सोनी


आपका  स्वागत  है पुन: परिकल्पना पर ...ब्रेक से पहले हम मुखातिब थे डी. डी. सोनी जी से ...आईये बातचीत के इस सिलसिले को आगे बढाते है ..... 




आपने इस क्षेत्र मे बहुत काम किया है तथा मै जानता हूँ  कि आपने गणतंत्र दिवस की झांकियों में भी अपने कला कौशल का उल्लेखनीय प्रयोग कि्या है कृपया इस विषय पर जानकारी दें?

बहुत बहुत आनंदित हूँ मै आज जो अपने विचारों को व्यक्त कर पा रहा हूँ , पहले हम गणतंत्र दिवस की परेड मे पोस्टर के माध्यम से जानकारी देते थे। ले्किन छोटे होने के कारण संदेश पु्री जनता तक नही पहुंच पाता था, फ़िर हमने इसे प्लाई बोर्ड पर बनाया तब भी ज्यादा लोगों तक नही पहुंच पाता था इसलिए फ़िर हमने चलित झांकियों का निर्माण शुरु किया। मेरे लिए यह एक बड़ा कैनवास था जिसे लाखों लोग प्रत्यक्ष तथा करोड़ों लोग टीवी के माध्यम से देख पाते थे. अगर कोई हमारी झांकी देख कर उससे प्रेरणा लेता है तो हमारा उद्देश्य हम सफल मानते हैं.

 लोग जब आर्ट एक्जीबिशन में जाते हैं चित्रकला प्रदर्शिन देखने लिए तो वहां आज कल परम्परागत चित्रों के साथ आधुनिक चित्रकला भी प्रदर्शित होती है. कुछ आदि तिरछी रेखाएं रंगों एवं प्रकाश के संयोजन से कैनवास पर बनाई जाती हैं. जिसे देख कर दर्शक सर हिला कर निकल जाता है. उसकी समझ में नहीं आता है. आप परंपरागत चित्रकला और आधुनिक चित्रकला के संबंध में बताये की हम उन्हें किस तरह समझे?

चित्रकार की पेंटिंग जो होती है वह समाज के लिए अलग, वरिष्ठ चित्रकारों के लिए अलग, आलोचक और समालोचक के लिए अलग होती है. इस तरह चित्रकार को भी कई मुकाम से गुजरना पड़ता है. सबकी अलग अलग डिमांड होती है. इसलिए जब हम एक्जीबिशन लगाते हैं तो एक बच्चे से लेकर वरिष्ठ चित्रकार तक की पसंद का ख्याल रखते हैं कि सबको कुछ तो कुछ पसंद आए. चित्रकार अपनी अनुभूतियों को चित्र के माध्यम से प्रदर्शित करता है आवश्यक नहीं है कि वह सभी को पसंद आये. सबकी पसंद अलग-अलग होती है. उसे पूरा करने का प्रयास किया जाता है.

क्या यह विधाएं पिता से पुत्र को परंपरागत रूप से हस्तांतरित होती हैं? क्या वर्त्तमान में भी गुरु शिष्य परंपरा से चित्रकारी और शिल्पकारी का प्रशिक्षण दिया जाता है?

कार्य कुशलता पिता से पुत्र को गुरु से शिष्य को  मिलती है लेकिन अगर हम कहें कि खानदान में चली आ रही है तो मैं नहीं मानता क्योंकि यह ईश्वर प्रदत्त होता है. हमारे जितने भी चित्रकार हैं उन्होंने अपने खानदानी काम से हट कर जगह बनाई है. जो किसी खानदान या घराने से जुड़े लोग है वो नयी चीज को देने में असमर्थ रहे.

साक्षात्कार अभी जारी है------
==========================================================================

अब आईये चलते हैं कार्यक्रम स्थल की ओर जहा सोनल रस्तोगी उपस्थित हैं अपनी एक कविता :बिना जुर्म सजा पायी है लेकर .....यहाँ किलिक करें  




=============================================================================
जारी है उत्सव मिलते हैं एक छोटे से ब्रेक के बाद

2 comments:

पूर्णिमा ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

गीतकार /geetkaar ने कहा…

मनोरम प्रस्तुति... पढ़कर मन रोमांचित हो उठा..

हिंदी ग़ज़ल की विकास यात्रा पर रवीन्द्र प्रभात का एक समग्र आलेख

हिंदी ग़ज़ल की विकास यात्रा पर रवीन्द्र  प्रभात का एक समग्र आलेख

परिकल्पना सम्मान-२०१०

परिकल्पना सम्मान-२०१०

LATEST:


लोकसंघर्ष परिकल्पना सम्मान-२०१०

Product Cloud