लेखकों से अनुरोध
परिकल्पना पर लिखने वाले लेखकों से अनुरोध है कि जो भी पोस्ट यहाँ पर लिखें,विस्तृत हो,सारगर्भित हो। अपने ब्लॉग पर प्रकाशित पोस्ट का लिंक यहाँ ना लगाएँ,ऐसा करने पर मजबूरन उन्हें हटाना पड़ेगा।
शुक्रवार, 14 मई 2010
हज़ारों हज़ार सिक्के पाकर भी हाथ और मन खाली रह जाते हैं .
एक रुपया और मन पीछे... आज में कुछ होगा नहीं और बचपन का क्या कहना ! मासूमियत, स्नेह, और प्यार से लबरेज बचपन समय का वह अनमोल तोहफा है, जो अतुलनीय है .
और उस बचपन में एक रूपये के सिक्के मिलने की ख़ुशी और रोमांच का तो जवाब नहीं. लगता था कि शहंशाह हो गए. सारी दुनिया
, सारे खिलौने, लेमनचूस, मख्खन का गोला और हवा मिठाई सब खरीद लेने की ललक मन से लेकर पेट तक में गुदगुदी पैदा
कर देती थी. उस एक रूपये के सिक्के के आने से आसमान में उड़ने जैसा आनंद मिलता था . साथ ही अपने हमजोलियों के बीच
कुछ अलग होने का एहसास भी मन को बड़ा सुख देता था . बचपन में वह एक रूपये का सिक्का महज एक सिक्का नहीं होता
था , बल्कि एक अनुभूति होती थी जो तन में फूर्ति , मन में उमंग और कल्पना में उड़ाने भरती थी . और अब उससे हज़ारों हज़ार गुना मिलते हैं,
जो महज क्षणिक ख़ुशी और ढेर सारे तनाव देता है ! पहला एहसास तो और अधिक मिलने की चाहत मन को दुःख देती है. फिर आज के भौतिक जीवन शैली , उपभोक्तावाद के मारे अनेकों emi का तनाव याद आता है. मिले हुए पैसों पर इनकम टैक्स की कटौती झुंझलाती है , बढे हुए पैर को
ढंकने के लिए चादर बढ़ने के प्रयास में सारी खुशियाँ , सारे सुख गुम हो जाते हैं और हज़ारों हज़ार सिक्के पाकर भी हाथ और मन खाली रह जाते हैं .
नवीन कुमार
पटना
========================================================
इस परिचर्चा को मैं आगे बढाऊंगी एक अल्प विराम के बाद, किन्तु उससे पहले आईये चलते हैं कार्यक्रम स्थल की ओर जहां अपनी कविताओं के साथ उपस्थित हैं श्री दीपक मशाल .....यहाँ किलिक करें
=========================================================
जारी है उत्सव मिलती हूँ एक अल्प विराम के बाद
और उस बचपन में एक रूपये के सिक्के मिलने की ख़ुशी और रोमांच का तो जवाब नहीं. लगता था कि शहंशाह हो गए. सारी दुनिया
, सारे खिलौने, लेमनचूस, मख्खन का गोला और हवा मिठाई सब खरीद लेने की ललक मन से लेकर पेट तक में गुदगुदी पैदा
कर देती थी. उस एक रूपये के सिक्के के आने से आसमान में उड़ने जैसा आनंद मिलता था . साथ ही अपने हमजोलियों के बीच
कुछ अलग होने का एहसास भी मन को बड़ा सुख देता था . बचपन में वह एक रूपये का सिक्का महज एक सिक्का नहीं होता
था , बल्कि एक अनुभूति होती थी जो तन में फूर्ति , मन में उमंग और कल्पना में उड़ाने भरती थी . और अब उससे हज़ारों हज़ार गुना मिलते हैं,
जो महज क्षणिक ख़ुशी और ढेर सारे तनाव देता है ! पहला एहसास तो और अधिक मिलने की चाहत मन को दुःख देती है. फिर आज के भौतिक जीवन शैली , उपभोक्तावाद के मारे अनेकों emi का तनाव याद आता है. मिले हुए पैसों पर इनकम टैक्स की कटौती झुंझलाती है , बढे हुए पैर को
ढंकने के लिए चादर बढ़ने के प्रयास में सारी खुशियाँ , सारे सुख गुम हो जाते हैं और हज़ारों हज़ार सिक्के पाकर भी हाथ और मन खाली रह जाते हैं .
नवीन कुमार
पटना
========================================================
इस परिचर्चा को मैं आगे बढाऊंगी एक अल्प विराम के बाद, किन्तु उससे पहले आईये चलते हैं कार्यक्रम स्थल की ओर जहां अपनी कविताओं के साथ उपस्थित हैं श्री दीपक मशाल .....यहाँ किलिक करें
=========================================================
जारी है उत्सव मिलती हूँ एक अल्प विराम के बाद
Labels:
कविता,
चौदहवाँ दिन,
ब्लोगोत्सव-२०१०

नई दिल्ली से सुषमा सिंह की एक विस्तृत रपट रविवार दिनांक 8 मई 2011 के दैनिक जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ में पेज 19 पर प्रकाशित।



































4 comments:
बढे हुए पैर को ढंकने के लिए चादर बढ़ने के प्रयास में सारी खुशियाँ , सारे सुख गुम हो जाते हैं और हज़ारों हज़ार सिक्के पाकर भी हाथ और मन खाली रह जाते हैं .
bahut sundar abhivyakti
http://laraibhaqbat.blogspot.com/2010/05/blog-post.html
नवीन जी की बातें मन को छू गयीं।
bilkul sach kaha sir...is bhagdaud ne hamse bahut kuch chheen liya...
एक टिप्पणी भेजें