लेखकों से अनुरोध
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शुक्रवार, 14 मई 2010
इमरोज़ मुबारक हो !
ब्लोगोत्सव के तेरहवें दिन परिचर्चा अधूरी रह गयी थी . समयाभाव के कारण हम नीलम प्रभा जी की अभिव्यक्ति को शामिल नहीं कर सके, इसलिए चौदहवें दिन का कार्यक्रम शुरू हो इससे पहले आईये नीलम प्रभा जी की अभिव्यक्ति को उसी परिचर्चा की आखिरी कड़ी के रूप में शामिल करते हैं -
इमरोज़ !
ये वो नाम है
जिसे जब कभी पढ़ा
जब कभी सुना
जब कभी सोचा
बेजान दरख्तों पर बसंत उतर आया
सख्त चट्टानें चश्मों में ढल गईं
रेत हुई नदियों के माथे
पावस के मेघों की बौर लग गई
मन चाह उठा, अनायास ही
एक इमरोज़-- मेरा अपना होता !
जो ऐसा होता, तो
गर्मियों की चांदनी में भीगी उन्माद भरी तेज़ हवा
जाड़ों की सिहरन में सनी इश्क की आँच सी धूप
एक साथ मिल जातीं
देखकर जिसे ----
मौत की हद से ज़िन्दगी का फासला कुछ और बढ़ जाता
गुज़री उम्र का ज़ख़्मी अंगूठा
सोलहवें बरस की चौखट से लड़ जाता
एक इमरोज़ की तलाश है मुझे
अमृता जी ,
क्या एक ट्रू कॉपी तुम्हारे इमरोज़ की
हो नहीं सकती ?
जिसका वजूद मेरे जीने का एहसास हो,
तुम्हारी तरह --
छूने से जिसके ,खुदा मेरे पास हो !
जिसकी पेशानी की लकीरों पे सुबह उगे
जिसके बांहों की गली में
मेरी हर रात ज़गे
मैं ख्वाब देखूं, वो उनकी ताबीर लाए
मैं तिनके चुनूँ , वो घर बनाये
जिसकी साँसों की तपिश के क़ुर्ब से
तुम्हारे भीतर का सारा आलम आसमान सा नीला हो गया
सदियों की खिजा का नक़्शे-कुहन
आषाढ़ की पहली बारिश में भीगी ज़मीन सा गीला हो गया --
क्योंकि इमरोज़ अकेला तुम्हारा है,
उसकी दूसरी प्रति हो नहीं सकती ... !
तुम्हारे नसीब का रुख जिस सितारे के संग जोड़ दिया
उसे गढ़कर खुदा ने वो सांचा तोड़ दिया
तो तुम्हारे इमरोज़ सा एक इमरोज़
मैं कहाँ से पाऊँगी !
तुम्हें तुमसे पूछे बगैर जो प्यार करता है
तुम्हारी सिफ़त से ज्यादा तुम्हारी खामियों पे खुद को निसार करता है
कोई कैसे आखिर इस बुत को सिजदा न करे !
कोई हमशक्ल हो इसका ---
इश्क की इबादत की कसम,
खुदा न करे !
पता है, मेरी खोज अधूरी है
क्या फिक्र दास्तान की !
अपने मकाम पे पूरी है
तारीक तन्हा रात का यह दूधिया चाँद !
अमृता जी , इमरोज़ मुबारक हो !
नीलम प्रभा
http://banjaaraa.blogspot.com/
========================================================================
ये रही श्री इमरोज पर आधारित परिचर्चा की आखिरी कड़ी , बस कुछ ही देर में उपस्थित हो रही हैं पुणे महाराष्ट्र की कवियित्री रश्मि प्रभा आज चौदहवें दिन के कार्यक्रम के संचालन हेतु .....ठीक ११ बजे परिकल्पना पर
इमरोज़ !
ये वो नाम है
जिसे जब कभी पढ़ा
जब कभी सुना
जब कभी सोचा
बेजान दरख्तों पर बसंत उतर आया
सख्त चट्टानें चश्मों में ढल गईं
रेत हुई नदियों के माथे
पावस के मेघों की बौर लग गई
मन चाह उठा, अनायास ही
एक इमरोज़-- मेरा अपना होता !
जो ऐसा होता, तो
गर्मियों की चांदनी में भीगी उन्माद भरी तेज़ हवा
जाड़ों की सिहरन में सनी इश्क की आँच सी धूप
एक साथ मिल जातीं
देखकर जिसे ----
मौत की हद से ज़िन्दगी का फासला कुछ और बढ़ जाता
गुज़री उम्र का ज़ख़्मी अंगूठा
सोलहवें बरस की चौखट से लड़ जाता
एक इमरोज़ की तलाश है मुझे
अमृता जी ,
क्या एक ट्रू कॉपी तुम्हारे इमरोज़ की
हो नहीं सकती ?
जिसका वजूद मेरे जीने का एहसास हो,
तुम्हारी तरह --
छूने से जिसके ,खुदा मेरे पास हो !
जिसकी पेशानी की लकीरों पे सुबह उगे
जिसके बांहों की गली में
मेरी हर रात ज़गे
मैं ख्वाब देखूं, वो उनकी ताबीर लाए
मैं तिनके चुनूँ , वो घर बनाये
जिसकी साँसों की तपिश के क़ुर्ब से
तुम्हारे भीतर का सारा आलम आसमान सा नीला हो गया
सदियों की खिजा का नक़्शे-कुहन
आषाढ़ की पहली बारिश में भीगी ज़मीन सा गीला हो गया --
क्योंकि इमरोज़ अकेला तुम्हारा है,
उसकी दूसरी प्रति हो नहीं सकती ... !
तुम्हारे नसीब का रुख जिस सितारे के संग जोड़ दिया
उसे गढ़कर खुदा ने वो सांचा तोड़ दिया
तो तुम्हारे इमरोज़ सा एक इमरोज़
मैं कहाँ से पाऊँगी !
तुम्हें तुमसे पूछे बगैर जो प्यार करता है
तुम्हारी सिफ़त से ज्यादा तुम्हारी खामियों पे खुद को निसार करता है
कोई कैसे आखिर इस बुत को सिजदा न करे !
कोई हमशक्ल हो इसका ---
इश्क की इबादत की कसम,
खुदा न करे !
पता है, मेरी खोज अधूरी है
क्या फिक्र दास्तान की !
अपने मकाम पे पूरी है
तारीक तन्हा रात का यह दूधिया चाँद !
अमृता जी , इमरोज़ मुबारक हो !
नीलम प्रभा
http://banjaaraa.blogspot.com/
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ये रही श्री इमरोज पर आधारित परिचर्चा की आखिरी कड़ी , बस कुछ ही देर में उपस्थित हो रही हैं पुणे महाराष्ट्र की कवियित्री रश्मि प्रभा आज चौदहवें दिन के कार्यक्रम के संचालन हेतु .....ठीक ११ बजे परिकल्पना पर
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चौदहवें दिन,
परिचर्चा,
ब्लोगोत्सव-२०१०

नई दिल्ली से सुषमा सिंह की एक विस्तृत रपट रविवार दिनांक 8 मई 2011 के दैनिक जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ में पेज 19 पर प्रकाशित।




































4 comments:
सुन्दर एहसास ...!!
प्यार के इन खामोश शब्दों की अभिव्यक्ती है ..एक अथाह समन्दर ..अथाह गहराई ..शाश्वत क्षण
Sundar ahsason ki prasuti....
इमरोज जी आधारित पूरी रचना-यात्रा खूबसूरत रही ! सबकुछ प्रेममय ! आत्मीय !
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