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सोमवार, 10 मई 2010

मेरी मान्यताओं को विभक्त करने से पहले अपने पर गौर करो

मेरे अपनों ,

मैं मोहनदास करमचंद गाँधी, आज आलोचनाओं के गुबार में अदृश्य होता जा रहा हूँ.....पर एक बार पीछे मुड़कर देखो- मैंने सत्य का आग्रह किया, अहिंसा की नीति अपनाई ,देश को स्वतंत्र धरती दी,- क्या स्वार्थ रहा मेरा, दो गज स्वतंत्र ज़मीन? क्या इसीलिए तुमने मेरा अस्तित्व नकार दिया, मेरे हर कृत्य की टुकडों में व्याख्या कर डाली? क्या मैं तुम्हारा अहम् प्रश्न हूँ? ........मैं तो बीत गया , पर मेरे उसूलों को आज अपना वर्तमान बनाकर देखो तो निःसंदेह एक दिन समवेत स्वर में गा सकोगे.

मेरी मान्यताओं को विभक्त करने से पहले अपने पर गौर करो, तुम विभक्त हो चले हो. एक भारत, पाकिस्तान का मसला उठाते-उठाते तुम खंडित-खंडित हो गए हो. हम आज फिर वहीँ हैं, जहाँ था-" दुश्मन बैठा घात लगाए, फिर कब गफलत होगी " की भावना के साथ !

मेरे अपनों, आज भी मेरा नम्र निवेदन है- मुझे भूल जाओ, मैं गलत था तो क्षमा करो,पर तुम देश के टुकडों को समेटो, जो आदर्श मैं नहीं दे सका - मेरे युवाओं तुम दे जाओ !

तुम्हारा,
गाँधी...





- रश्मि प्रभा



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रश्मि प्रभा के इन विचारों को आत्मसात करने के बाद आईये चलते है कार्यक्रम स्थल की ओर जहां विवेक रस्तोगी उपस्थित हैं अपनी कविता के साथ .......यहाँ किलिक करें
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जारी है उत्सव मिलते हैं एक अल्प विराम के बाद

8 comments:

mala ने कहा…

रश्मि जी के विचार अत्यंत ही सारगर्भीत है , आभार !

पूर्णिमा ने कहा…

गाँधी के दर्द को बाखूबी वायान करने हेतु कॉटिश: आभार

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

गाँधी एक नाम नहीं एक काल थे और उनकी प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होती और होना भी नहीं चाहिए. हम किसी भी रास्ते पार चले जब मूढ़ कर देखते हैं तो पता चलता है वही रास्ता सबसे सुलभ और सही हैं. गाँधी के भाव आपके शब्दों में और भी प्रभावशाली बने है.

Babli ने कहा…

गाँधी जी के बारे में आपने बहुत ही सुन्दर रूप से लिखा है! उम्दा प्रस्तुती!

सुनील दत्त ने कहा…

गांधी जी अगर आपने गांधीबाद छोड़ कर भारत के विभाजन का अपने प्राण जाने तक विरोध किया होता या फिर कांग्रेस को खत्म कने के अपने सुझाब पर खुद अमल किया होता तो आज का युबा इतना मजबूर न होता।

sangeeta swarup ने कहा…

गाँधी नाम नहीं है एक व्यक्ति का....नाम है एक विचारधारा ....सच है कि कल बीत चुका है....पर जो कल आएगा उसके लिए एकनिष्ठ हो कर करना है....मात्र सोचना नहीं है....बहुत सार्थक विचार

jenny shabnam ने कहा…

rashmi ji,
aaj baapu hote to desh ki dasha par apne mann ki vyathaa jo aapne likhi hai , shayad bol paane ki himmat na juta paate, kyunki baapu ko bhi logon ne baant diya hai. kaash baapu hote kuchh to saamajik chetna jaga sakte...
shubhkaamnayen.

संत शर्मा ने कहा…

मेरे अपनों, आज भी मेरा नम्र निवेदन है- मुझे भूल जाओ, मैं गलत था तो क्षमा करो,पर तुम देश के टुकडों को समेटो, जो आदर्श मैं नहीं दे सका - मेरे युवाओं तुम दे जाओ !

Bahut sundar.

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