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बुधवार, 12 मई 2010

'भगवान् ने एक इमरोज़ बनाकर सांचा ही तोड़ दिया : सरस्वती प्रसाद



इमरोज़ !
यानि - आज
रब की दें
इबादत में सर झुक जाता है !
इमरोज़ !
ओस नहाई भोर
या पूनम की रात ...
कोई इतना सहज, सरल ,पारदर्शी हो सकता है
-यह सुबह,शाम,उनके बारे में सुनते हुए जाना
इमरोज़ !
प्यार के बेमिसाल स्तम्भ
मधुरतम भावनाओं की सच्चाई हैं
-स्फटिक की तरह...
अमृता के इमरोज़ !
प्यार को पूजा माननेवालों के दिलों में रहते हैं
बेटी नीलू ने वर्षों पहले ठीक ही लिखा था
'भगवान् ने एक इमरोज़ बनाकर
सांचा ही तोड़ दिया '



सरस्वती प्रसाद
http://kalpvriksha-amma.blogspot.com/
 
 
 
 
 
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परिचर्चा को हम आगे बढ़ाएंगे एक अल्प विराम के बाद , उससे पहले चलिए चलते हैं कार्यक्रम स्थल की ओर जहां वेनिस की एक शाम गुजारने की अनुभूतियों को वयां कर रही हैं शिखा वार्ष्णेय .....यहाँ किलिक करें 
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जारी है उत्सव मिलते हैं एक अल्प विराम के बाद

1 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

एक इबादत इमरोज़ एक निःसंदेह मेरी अम्मा सरस्वती प्रसाद

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