मैंने हर काल खंड को भोगा है और महसूस की है उस खंड की सृजनात्मकता को ...मेरे पन्नों में दर्ज है हिंदी का पूर्वार्द्ध, उत्तरार्द्ध ....छायावाद , प्रयोगवाद, प्रगतिवाद , समाजवाद आदि आदि, किन्तु एक बात जो सभी परिवेश में मुझे दिखी है वह है सृजनात्मकता के मायनों की साम्यता !
चाहे कोई भी काल-खंड रहा हो-
कवि को कविधर्म निभाने की दिशा में अपने सूक्ष्म भाव को व्यक्त करने हेतु इन्द्रिय ग्राह्य शब्दों का बड़ा ही सटीक प्रयोग करना पडा है, क्योंकि उसके एक-एक शब्द पूरे प्रकरण में इस प्रकार फिट रहते हैं कि उनके संधान पर कोई अन्य पर्यायवाची शब्द रखने से पूरी की पूरी भाव श्रृंखला भरभरा जाती है .
निष्कर्ष में यही कहा जा सकता है कि टूटते हुए मिथक और चटकती हुई आस्थाओं के बीच कविता कथ्य-शिल्प और भाव तीनों ही दृष्टिकोण से श्रेष्ठता कि परिधि में आ जाए तभी काव्य की सार्थकता है , अन्यथा नहीं . शब्दों की उपयुक्तता को ही ध्यान में रखकर पाश्चात्य विचारक कालरिज ने कविता को " श्रेष्ठतम शब्दों का श्रेष्ठतम क्रम" कहा है .
आज आयोजक ने कई श्रेष्ठ कवियों/कवयित्रियों को इस उत्सव में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है , उनकी कविताओं का वाचन करें इससे पहले आईये चलते हैं श्री अरविन्द श्रीवास्तव के पास यह जानने के लिए कि अंतरजाल पर कवियों की विश्राम स्थली कहाँ-कहाँ है .....यहाँ किलिक करें

नई दिल्ली से सुषमा सिंह की एक विस्तृत रपट रविवार दिनांक 8 मई 2011 के दैनिक जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ में पेज 19 पर प्रकाशित।


































3 comments:
bahut khoob!!!
आईये... दो कदम हमारे साथ भी चलिए. आपको भी अच्छा लगेगा. तो चलिए न....
अच्छा लगा ...बधाई !
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