आज की कविता के सन्दर्भ में एक आलोचक का कहना है कि आज की कविता अपने पाठक खो रही है, क्योंकि उसमें बौद्धिक एकाकीपन बहुत है, उसे न किसी की मर्माहत कातर पुकार सुनाई देती है और न किसी की दहशत पैदा करने वाली दहाड़ । दूसरा कारण यह है कि वह दिलचस्प नहीं रही । तीसरी वजह यह है कि हिन्दी कविता में इधर नागर कविता का बोलबाला बढ़ा है जो कि शरारती और चालाक है तथा इस कारण कविता से सहजता , एन्द्रिकता और भावावेग की विदाई हो गयी है । मैं इन बातों से इत्तेफाक नहीं रखता , क्योंकि मैं उन सारी चीजों को आज की कविताओं में पाता हूँ जिसे वे नहीं देख पा रहे हैं । विश्वास नहीं होता तो आज की ये तीनों कविताओं को देखिये फिर बताईये क्या उनकी टिपण्णी सही है ?(1) आईये सबसे पहले चलते हैं संगीता सेठी के पास उनकी कविताओं को महसूस करने ....यहाँ किलिक करें
(2)अब चलिए चलते हैं संगीता स्वरुप जी के पास .......यहाँ किलिक करें
(3)और अब हर दिल अजीज मस्त मौला कवि कुलवंत हैप्पी के पास .....यहाँ किलिक करें
.........जारी है उत्सव मिलते हैं एक अल्पविराम के बाद

नई दिल्ली से सुषमा सिंह की एक विस्तृत रपट रविवार दिनांक 8 मई 2011 के दैनिक जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ में पेज 19 पर प्रकाशित।


































1 comments:
अच्छा लगा ...बधाई !
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