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शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

समकालीन हिंदी काव्य की दिशा-दशा पर......अपनी बात

कहा जाता है कि जब कोई कवि वस्तु जगत में स्थित किसी भाव, घटना या तत्त्व से संवेदित होता है तो वह उसे अपनी समर्थ काव्य भाषा द्वारा सहृदय तक संप्रेषित करने का उपक्रम करता है . वह आपने अभिप्रेत भाव को तद्भव रूप में संप्रेषित करने के लिए अपने सृजन क्षण में, शब्दों की सामर्थ्य एवं सीमा का शूक्ष्म संधान कर उसे प्रयुक्त करता है . काव्य रचना अपने आरंभिक क्षण से ही एक सायास क्रिया के रूप में आरंभ हो जाती है, क्योंकि कवि के मानस कल्प में शब्दों की होड़ सी लग जाती है . यही शब्द श्रृंखलाबद्ध होकर काव्य का रूप ले लेता है . जिस काव्य में हमारे समय के महत्वपूर्ण सरोकारों, सवालों से टकराती एक विशेष रूप और गुणधर्म वाली बात परिलक्षित हो वही समकालीन काव्य है ऐसा माना जाता है.

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जारी है उत्सव मिलते हैं एक अल्पविराम के बाद

1 comments:

पूर्णिमा ने कहा…

अच्छा लगा ...बधाई !

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