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शनिवार, 4 सितम्बर 2010

वजह क्या है ?



भूख-वहशी , भ्रम -इबादत वजह क्या है
हो गयी नंगी सियासत , वजह क्या है ?

मछलियों को श्वेत बगुलों की तरफ से -
मिल रही क्या खूब दावत , वजह क्या है ?

राजपथ पर लड़ रहे हैं भेडिये सब -
आम -जन की जान आफत , वजह क्या है ?

वीर योद्धाओं के पावन मुल्क में अब -
खो गयी मर्दों की ताक़त , वजह क्या है ?

आजकल बेटों को अपने बाप की भी -
कड़वी लगती है नसीहत , वजह क्या है ?

यूँ ग़ैर की करते तरफदारी '' प्रभात''
क्यों नहीं अपनों की चाहत , वजह क्या है ?

() रवीन्द्र प्रभात

(कॉपी राइट सुरक्षित )

8 comments:

मीनाक्षी ने कहा…

ऐसा क्यों हुआ , कैसे हुआ , कब हुआ , सवाल है उलझा हुआ... कुछ ऐसा ही सवाल मेरे बेटे ने किया था तब एक कविता ने जन्म लिया था ... याद आ गई , अब उसे शीघ्र ही पोस्ट करूँगी.

मयन्क मिश्रा ने कहा…

प्रिय रवीन्द्र जी,
एक बार फिर वेहद सुंदर और सामयिक प्रस्तुति हेतु बधाईयाँ!

madani ने कहा…

यूँ ग़ैर की करते तरफदारी '' प्रभात''
क्यों नहीं अपनों की चाहत , वजह क्या है ?

बहुत अच्छा है हुज़ूर. पते की बात कह गए आप.

दीपक भारतदीप ने कहा…

आपके प्रश्न चिंतन का विषय है।
दीपक भारतदीप

रश्मि प्रभा... ने कहा…

वजह बस इतनी सी है कि सब गुमनामी के अंधेरों की तरफ अग्रसर है , स्थिति दुखद नहीं जानलेवा है

mala ने कहा…

वेहद सुंदर और सामयिक प्रस्तुति हेतु बधाईयाँ!

पूर्णिमा ने कहा…

आपने सबकुछ कह दिया और पूछ रहे हैं वजह क्या है ?
इस पर मैं यही कहूंगी क्या बात है?

गीतेश ने कहा…

बहुत खूब प्रभात जी,
अच्छी लगी आपकी ग़ज़ल !

हिंदी ग़ज़ल की विकास यात्रा पर रवीन्द्र प्रभात का एक समग्र आलेख

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