वटवृक्ष

फूलपुर में राहुल की सभा में दबंग के चुलबुल पांडे टाईप मंत्रियों के द्वारा शांतिपूर्वक विरोध करने वाले लड़कों की  पिटाई की बात सुनि के रामभरोसे एकदम सेंटिमेंटल हो गया और मुड़ि पीटत सनकाह के जैसा  चौबे जी के चौपाल में आ गया । चौबे जी से बोला कि  – “महाराज चमचई की हद हो गई । आपन कृत्य से देश की कमर तोड़े से संतोष ना भईल मंत्री लोगन के तs चल अईलें उत्तर प्रदेश मा जनता के पीटे-पटके । माना कि अवोध लईकन सब ई कहके विरोध कईलें कि मंहगाई और भ्रष्टाचार से निजात काहे नाही दिलवाती है आपकी सरकार, तो युवराज केवल इतना कह देते कि क्यों पैर पर कुल्हाड़ी चलाने को कह रहे हो ? ये तो चुनावी मुद्दे हैं भला इससे कैसे निजात मिल सकता है ? उत्तर प्रदेश की जनता वेबकूफ थोड़े न है जे उनकी बतकही नही समझती। खैर युवराज तो अभी ४२ बरस के बच्चा हैं, जब साठा होईहें तब पाठा मारिहें, मगर तिवारी जी के का भईल रहे कि उतर गईलें पीटे-पटके ?”

देखो राम भरोसे पीटने-पटकने में जो मजा है ऊ चूमने में कहाँ ? राजनीति का पहिला पाठ है कि जनता का दिल-दिमाग-हाथ-पैर टूटे तो टूटे, मुद्दे नही टूटने चाहिए । जब इहे बात का अनुसरण किये हैं हमरे मंत्री जी,तो कवन गुनाह कर दिए ?  ई अलग बात है कि सार्वजनिक रूप से पीटो-पटको तो इन्डियन पैनल कोड के तहत धारा ३२३ लगा देत  है हमरी लोकल पुलिस , गाली दो तो ५०४ लगा देत है ,  मगर धारा बनाने वालों पर ससुरी कैसी धारा ? भाई देख, जे बनावत हएं ओही के बिगारे के अधिकार होत हैं नs ? हमरी सरकार के मंत्री क़ानून बानावत हएं तs बिगारिहें के,ऊहे बिगारिहें नs ? अब गैर जमानती वारंट जारी हो चाहे जमानती का फर्क पडत है ? नेता हैं कवनो अभिनेता नाही जे डर जयिहें । हमका बुझात है राम भरोसे कि बिना दस-बीस धारा लगे सही मायनों में कोई नेता नाही बन सकत । उनके खातिर पहचान कs सबसे बड़ा संकट उत्पन्न होई जात हैं । मन के भीतर अन्हरिया रहे तो रहे, मगर युवराज के सामने कोई करिया कपड़ा दिखाए ई बर्दास्त करे वाली बात ना है । धारा लगे तो लगे युवराज की  नज़र मा इज्जत ना धोआये के चाहीं । अरे सार्वजनिक रूप से बिना अंजाम की परवाह किये बगैर पीटना-पटकना कवनो आसान काम है का ? हमको तो लगता है तिवारी जी,जतिन जी आऊर फलाना जी,चिलाना जी आदि-आदि जे भी जी शामिल रहे ऊ चटकन-पटकन जइसन सत्संग में, सबके -सब सोनिया चाची के विशेष इनाम के हकदार हैं ।“ चौबे जी ने कहा ।

एकदम्म सही कहत हौ चौबे जी, हम तोहरे बात कऽ समर्थन करत हईं ।एगो कहावत  है कि  बड़ जीव बतियवले, छोट जीव लतियवले। पहिले के ज़माना में बड जीव सवर्ण के कहल जात रहे और छोट जीव अवर्ण के । मगर  ज़माना बदल गवा है महाराज । अब बड जीव का मतलब नेता होत है और छोट जीव का मतलब जनता ।  यानी कि ये भी बड़े,वे भी बड़े, छोटी बस जनता। ऐसे में जनता लातियावल ना जाई तो का पूजा पूजल जाई ? वैसे भी आजकल  वेशर्मी बुरी आदत की श्रेणी मा नाही आवत सम्मान की श्रेणी मा आवत हैं । अगर वेशर्मी नाही तो नेता कैसा चौबे जी ? गुल्टेनवा ने कहा ।

उ सब तो ठीके है  गुलटेन भईया लेकिन कहीं ई देश के छोट जीव यानी शर्मीली जनता मिस्र और लीबिया के नाहिन वेशर्म हो गइल तो ? गजोधर कहले

जाये द गजोधर, एकर उत्तर देबे में हमरा के शर्म महसूस होत है,बोली तिरजुगिया की माई ।

इतना सुनकर रमजानी मियाँ झुंझलाया और अपनी लंबी दाढ़ी सहलाते हुए फरमाया कि बरखुरदार  ई उत्तर प्रदेश है कवनो लाल बुझक्कर का देश नाही है । जनता के छोट जीव समझेवाला बड जीव यानी खुरपेंचिया जी टाईप नेता के शायद नाही मालूम कि जनता शब्द से आभास है ताक़त का, एकजुटता का । उस  एकता का जे नाईंसाफी पर राज बदले में देर नाही करत । तख्तो-ताज बदल देत हैं पान मा चुना लगा के । माहौल बदल देत हैं झटके में । यहाँ तक कि नयी इबारत लिख देत हैं । उत्तरप्रदेश की जनता कबो केहू से कम नाही रही है । हमार इतिहास ई बात कs साक्षी है मियाँ ।कलयुग है तो जाहिर है उतने सत्यवादी हरिश्चंद्र पैदा ना होईहें जेतना अपराधी जन्म लिहें ।मगर इसका मतलब ये तो नही होना चाहिए कि वे वेशर्मी से सिर उठाये और हम्म शरमा जाएँ । मंत्री-संत्री के टोके के, रोके के, शांतिपूर्वक प्रदर्शन करे के भी हक नाही है का हमके ? क्या ये आज़ादी हमने हलवा-पूरी खाकर पायी थी ? नाही उस समय भी हम्म नंगे वदन भूखे पेट रहकर गोरों को यहाँ से विदा किये थे । जब हम्म अंग्रेजन के विदा कर सकत हईं तो का आपन राज्य मा  अपना हाथ से तकदीर नाही लिख सकत ? मंहगाई से अभी चावल-दाल का भाव जनता के पता चलत हैं चुनाव के बाद नून-तेल का भाव जब खुरपेंचिया जी टाईप नेता के पता चली तब समझ मा आई सार्वजनिक सभा में जनता के लातियाबे का मतलब । फिर गंभीर होते हुए उसने अपने कत्थई दांतों पर चुना मारा और सलाहियत के साथ कहा कि लो, इसी मौजू पर दुष्यंत साहब ने अर्ज़ किया है कि – नज़रों में आ रहे हैं नज़ारे बहुत बुरे,होठों में आ रही है जुबान और भी खराब ।

विल्कुल सही कहत हौ रमजानी मियाँ, मगर ई सच्चाई के भी खारिज ना कएल जा सकत हैं कि आदमी थोड़े प्रयास के बाद नेता बन सकत है, मगर नेता लाख कोशिश कर ले आदमी नहीं बन सकत । आदमी की आँखों में पानी idm crack होत है , मगर नेता कीआँखों में पानी नहीं होत। आदमी गलती करने के बाद शर्म से झुक जात है , मगर  नेता फर्श से अर्श पर पहुँच जात है। आदमी जागे के बखत जाग जात है, मगर नेता कुछ भी हो जाए पांच साल के बाद ही जागत है जब टिकट के जरूरत महसूस होत हैं ।आदमी खातिर स्व से उंचा चरित्र होत है,मगर नेता के चरित्र के ऊपर मैं हावी होत है ।आदमी रिश्तों में सराबोर होत है , नेताओं में केवल गठजोड़ होत है ।इहे हs विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सच्चाई । इतना कहकर चौबे जी ने चौपाल अगले शनिवार तक के लिए स्थगित कर दिया।

रवीन्द्र प्रभात  

जनसंदेश टाईम्स/२०.११.२०११

 

Labels: चौबे जी की चौपाल

सोमवार, १४ नवम्बर २०११

हुजूर दाग अच्छे हैं !

चौबे जी की चौपाल 

आज चौबे जी की चौपाल लगी है राम भरोसे की मडई में । चटकी हुई है चौपाल । चुहुल भी खुबई है । खुले बरामदे में पालथी मार के बैठे हैं चौबे जी महाराज और कह रहे हैं कि “दामन पर कवनो दाग ना होना हमरी नज़र मा पहचान का सबसे बड़ा संकट है राम भरोसे । अगर नेताओं के दामन पर कोई दाग नाही है तो समझो भैया उसका नेता होना ही बेकार है। काहे कि अति विशिष्ट होत है दागदार नेताओं की पहचान । सफलता और प्रसिद्धि कs फार्मूला हs दामन पर बेतरतीब दाग । जे दाग से स्नेह करत हैं उनके मिलत हैं कुर्सी और जे दाग से नफ़रत करत हैं उनके मिलत हैं औपचारिकता और खानापूर्ति । जे सफल नेता होत हैं ऊ हरकत अईसन करत हैं कि दाग लगे। दाग लगिहें तो प्रसिद्धि मिलिहें। देश और इलाके के अलावा बाहर के वोटर भी उनके जनिहें। चुनाव के दौरान अपने चरित्र के विषय मा बताबे में कवनो मशक्कत ना करे के पडी उनके। दामन पर दाग बनल रही तो हचक के वोट भी मिलिहें और नोट भी। हमके तs ई बात की बहुत प्रसन्नता है कि हमरे देश के नेता अपने दागों के प्रति बहुत सहज और सजग रहत हैं। लेकिन का बताएं राम भरोसे, हमार करेजा फुन्काएल है इहे कुफुत से कि ‘दाग ढूँढते रह जाओगे’ के तर्ज पर आजकल एक से एक उपाय करे में लागल है हमरी सरकार। मगर मजबूर प्रधान मंत्री के कुछ मजबूत और समझदार सिपहसलार बार-बार इहे दुहारावत हैं कि हुजूर दाग अच्छे हैं । अरे कलमुंहे, जब दाग अच्छे हैं तो मिटावे खातिर जनता जनार्दन का सब साबुन,सोडा,सर्फ़ काहे खपा रहे हो। हमको तो अब बुझा रहा है कि कहीं दाग धोअत-धोअत ससुरी इज्जतो न धोआ जाए।”

अरे नाही चौबे जी, ई कलमुंही सत्ता बड़ी पावरफूल चीज होत हैं। सरकार बनते ही सत्ता का डिटर्जेट सारे दाग आसानी से धो देत है। काहे कि राजनीति मा दाग से कवनो परहेज नहीं होत । मगर घबराये के कवनो जरूरत नाही। सुने में आईल हs कि घर आऊर दूकान के अन्दर तक का नज़ारा दिखाएगा अब गूगल । फिर तो दाग छुपाते रह जायेंगे। अब तो बाथरूम में भी दिल खोलकर नही नहा पायेंगे अपने खुरपेंचिया जी। बोला राम भरोसे।

इतना सुनके रमजानी मियाँ ने अपनी लंबी दाढ़ी सहलाई और पान की गुलगुली दबाये कत्थई दांतों पर चुना मारते हुए कहा कि “लाहौल विला कूबत ,गूगल वालों का हो गया है दिमाग खराब। इतने दाग कम थे जो और दिखाएँगे। आपका खेत नs हरा-भरा है, जिसका खेत सूखा है ऊ तो खाद-पानी देगा हीं ? इसी मौजू पर एक शेर फेंक रहा हूँ मियाँ लपक सकते हो तो लपक लो, अर्ज़ किया है कि खुद पर न इतना सितम ढाया करो, दाग अच्छे हैं डिटर्जेंट के पैसे बचाया करो …!”

रमजानी मियां का शेर सुनकर उछल पडा गुलटेनवा। करतल ध्वनि करते हुए बोला “वाह-वाह रमजानी मियाँ वाह, का तुकबंदी मिलाये हो मियाँ ! एकदम्म सोलह आने सच बातें कही है तुमने। ई विषय पर अपने खुरपेंचिया जी भी कहते हैं कि राजनीति मा दागों का बुरापन कवनो मायने नाही रखत। दाग अच्छे हैं के दर्शन और सिद्धांत जे नेता भांप लेत हैं ऊ दाग पर दाग चढ़ावत चलत हैं । उनके दाग पर इतने दाग चढ़ जात हैं कि मूल दाग अपने आप मिट जात हैं ससुर । हमरे समझ से दाग बुरे नाही होत, नजर बुरी होत है। दाग हैं तो अच्छे हैं।”

लेओ रमजानी भईया के शेर पर एक सवा शेर हमरे तरफ से भी सुन लेयो। अर्ज़ किया है कि ‘दाग नही तो पथराई है आँखें फीका-फीका सा चेहरा है,दागे सियासत है जिसके पास उसका भविष्य सुनहरा है’ ….अछैबर बोले ।

इसका मतलब ई हुआ अछैबर कि पैसा कमाना कवनो गुनाह नाही है ….पैसा है तो पावर है, इज्जत है, पैसा है तो प्रशंसा है, प्रसिद्धि है। पैसा है तो ससुरा जेल भी फाईव स्टार होटल से कम नाही । पैसा नाही है तो अच्छे-अच्छों के गाल पिचक जात हैं,चौक-चौराहा पर ऊ तमाशा बन जात हैं। ज़रा सोचो दाल में काला होना गुनाह के संकेत मानल जात हैं, दाल पिली हो या काली दाल तो दाल हीं है न,जब कलमुंही पूरी की पूरी दाल हीं काली है तो गुनाह कैसा ? और जब गुनाह, गुनाह हीं नही है तो डर काहे का ? बोला गजोधर ।

इतना सुनके तिरजुगिया की माई से ना रहल गईल, कहली कि -“वुद्धिभ्रष्ट हो गई है तुम सब की। ज़रा सोचs लोगन कि जवन देश की दो तिहाई आवादी मंहगाई रूपी सुरसा के मुंह मा जबरन घुस के आत्महत्या करे पर उतारू हो, ऊ देश मा चुनाव के नाम पर करोड़ों फूंक दिहल जात है । जवन देश की आधी आवादी वेरोजगार हो उहाँ नेताओं को रोजगार देवे के नाम पर अरवों कुर्वान कर दिहल जात है । लोकतंत्र का ऐसा बड़ा और मंहगा मजाक और का होई कि जवन धन से ई देश मा बिजली जले के चाही उहे धन से राजनीति की लौ जलत हैं। इसके वाबजूद अगर यह कहा जाए कि राजनेताओं को जनता की चिंता है तो इससे बड़ा सफ़ेद झूठ और का हो सकत है ? खुद करे तो इमानदारी और दूसरा करे तो चोरी ?”

तिरजुगिया की माई की बतकही सुनके चौबे जी गंभीर हो गए और उन्होंने कहा कि “तोहरी बात मा दम है तिरजुगिया की माई, मगर कबीर का ज़माना बीत गया है अब।उस समय जनसेवकों की समस्या थी कि मैली चादर ओढ़कर कैसे जाया जाए? जाया ही नहीं बल्कि मुँह कैसे दिखाया जाए? बड़ी परेशानी थी दाग को लेकर। इसीलिए कबीर जैसे लोग जिंदगी भर एक ही चादर को ओढ़ा और बिना दाग लगाए जस की तस धर गये। बिता दिए पूरा जीवन फकीरी में । लेकिन आज का युग जनसेवकों का नही चतुर नायकों का युग है जिसमें कहीं जाना हो तो मैली चादर ओढ़कर जाने का रिवाज़ है । स्वच्छ चादर के खतरे अधिक हैं। मैली चादर को कोई खतरा नहीं। दाग भी लगने से पहले बीस बार सोचेगा, लगूँ कि ना लगूँ। इसलिए सत्ता चलाने वाले राजनेताओं पर तो विज्ञापन की यह पंच लाइन एकदम फिट है …..कि दाग अच्छे हैं…।। इतना कहके चौबे जी ने चौपाल अगले शनिवार तक के लिए स्थगित कर दिया ।


आज चौबे जी की चौपाल लगी है राम भरोसे की मडई में । चटकी हुई है चौपाल । चुहुल भी खुबई है । खुले बरामदे में पालथी मार के बैठे हैं चौबे जी महाराज और कह रहे हैं कि “दामन पर कवनो दाग ना होना हमरी नज़र मा पहचान का सबसे बड़ा संकट है राम भरोसे । अगर नेताओं के दामन पर कोई दाग नाही है तो समझो भैया उसका नेता होना ही बेकार है। काहे कि अति विशिष्ट होत है दागदार नेताओं की पहचान । सफलता और प्रसिद्धि कs फार्मूला हs दामन पर बेतरतीब दाग । जे दाग से स्नेह करत हैं उनके मिलत हैं कुर्सी और जे दाग से नफ़रत करत हैं उनके मिलत हैं औपचारिकता और खानापूर्ति । जे सफल नेता होत हैं ऊ हरकत अईसन करत हैं कि दाग लगे। दाग लगिहें तो प्रसिद्धि मिलिहें। देश और इलाके के अलावा बाहर के वोटर भी उनके जनिहें। चुनाव के दौरान अपने चरित्र के विषय मा बताबे में कवनो मशक्कत ना करे के पडी उनके। दामन पर दाग बनल रही तो हचक के वोट भी मिलिहें और नोट भी। हमके तs ई बात की बहुत प्रसन्नता है कि हमरे देश के नेता अपने दागों के प्रति बहुत सहज और सजग रहत हैं। लेकिन का बताएं राम भरोसे, हमार करेजा फुन्काएल है इहे कुफुत से कि ‘दाग ढूँढते रह जाओगे’ के तर्ज पर आजकल एक से एक उपाय करे में लागल है हमरी सरकार। मगर मजबूर प्रधान मंत्री के कुछ मजबूत और समझदार सिपहसलार बार-बार इहे दुहारावत हैं कि हुजूर दाग अच्छे हैं । अरे कलमुंहे, जब दाग अच्छे हैं तो मिटावे खातिर जनता जनार्दन का सब साबुन,सोडा,सर्फ़ काहे खपा रहे हो। हमको तो अब बुझा रहा है कि कहीं दाग धोअत-धोअत ससुरी इज्जतो न धोआ जाए।”

 

अरे नाही चौबे जी, ई कलमुंही सत्ता बड़ी पावरफूल चीज होत हैं। सरकार बनते ही सत्ता का डिटर्जेट सारे दाग आसानी से धो देत है। काहे कि राजनीति मा दाग से कवनो परहेज नहीं होत । मगर घबराये के कवनो जरूरत नाही। सुने में आईल हs कि घर आऊर दूकान के अन्दर तक का नज़ारा दिखाएगा अब गूगल । फिर तो दाग छुपाते रह जायेंगे। अब तो बाथरूम में भी दिल खोलकर नही नहा पायेंगे अपने खुरपेंचिया जी। बोला राम भरोसे।

इतना सुनके रमजानी मियाँ ने अपनी लंबी दाढ़ी सहलाई और पान की गुलगुली दबाये कत्थई दांतों पर चुना मारते हुए कहा कि “लाहौल विला कूबत ,गूगल वालों का हो गया है दिमाग खराब। इतने दाग कम थे जो और दिखाएँगे। आपका खेत नs हरा-भरा है, जिसका खेत सूखा है ऊ तो खाद-पानी देगा हीं ? इसी मौजू पर एक शेर फेंक रहा हूँ मियाँ लपक सकते हो तो लपक लो, अर्ज़ किया है कि खुद पर न इतना सितम ढाया करो, दाग अच्छे हैं डिटर्जेंट के पैसे बचाया करो …!”

रमजानी मियां का शेर सुनकर उछल पडा गुलटेनवा। करतल ध्वनि करते हुए बोला “वाह-वाह रमजानी मियाँ वाह, का तुकबंदी मिलाये हो मियाँ ! एकदम्म सोलह आने सच बातें कही है तुमने। ई विषय पर अपने खुरपेंचिया जी भी कहते हैं कि राजनीति मा दागों का बुरापन कवनो मायने नाही रखत। दाग अच्छे हैं के दर्शन और सिद्धांत जे नेता भांप लेत हैं ऊ दाग पर दाग चढ़ावत चलत हैं । उनके दाग पर इतने दाग चढ़ जात हैं कि मूल दाग अपने आप मिट जात हैं ससुर । हमरे समझ से दाग बुरे नाही होत, नजर बुरी होत है। दाग हैं तो अच्छे हैं।”

लेओ रमजानी भईया के शेर पर एक सवा शेर हमरे तरफ से भी सुन लेयो। अर्ज़ किया है कि ‘दाग नही तो पथराई है आँखें फीका-फीका सा चेहरा है,दागे सियासत है जिसके पास उसका भविष्य सुनहरा है’ ….अछैबर बोले ।

इसका मतलब ई हुआ अछैबर कि पैसा कमाना कवनो गुनाह नाही है ….पैसा है तो पावर है, इज्जत है, पैसा है तो प्रशंसा है, प्रसिद्धि है। पैसा है तो ससुरा जेल भी फाईव स्टार होटल से कम नाही । पैसा नाही है तो अच्छे-अच्छों के गाल पिचक जात हैं,चौक-चौराहा पर ऊ तमाशा बन जात हैं। ज़रा सोचो दाल में काला होना गुनाह के संकेत मानल जात हैं, दाल पिली हो या काली दाल तो दाल हीं है न,जब कलमुंही पूरी की पूरी दाल हीं काली है तो गुनाह कैसा ? और जब गुनाह, गुनाह हीं नही है तो डर काहे का ? बोला गजोधर ।

इतना सुनके तिरजुगिया की माई से ना रहल गईल, कहली कि -“वुद्धिभ्रष्ट हो गई है तुम सब की। ज़रा सोचs लोगन कि जवन देश की दो तिहाई आवादी मंहगाई रूपी सुरसा के मुंह मा जबरन घुस के आत्महत्या करे पर उतारू हो, ऊ देश मा चुनाव के नाम पर करोड़ों फूंक दिहल जात है । जवन देश की आधी आवादी वेरोजगार हो उहाँ नेताओं को रोजगार देवे के नाम पर अरवों कुर्वान कर दिहल जात है । लोकतंत्र का ऐसा बड़ा और मंहगा मजाक और का होई कि जवन धन से ई देश मा बिजली जले के चाही उहे धन से राजनीति की लौ जलत हैं। इसके वाबजूद अगर यह कहा जाए कि राजनेताओं को जनता की चिंता है तो इससे बड़ा सफ़ेद झूठ और का हो सकत है ? खुद करे तो इमानदारी और दूसरा करे तो चोरी ?”

तिरजुगिया की माई की बतकही सुनके चौबे जी गंभीर हो गए और उन्होंने कहा कि “तोहरी बात मा दम है तिरजुगिया की माई, मगर कबीर का ज़माना बीत गया है अब।उस समय जनसेवकों की समस्या थी कि मैली चादर ओढ़कर कैसे जाया जाए? जाया ही नहीं बल्कि मुँह कैसे दिखाया जाए? बड़ी परेशानी थी दाग को लेकर। इसीलिए कबीर जैसे लोग जिंदगी भर एक ही चादर को ओढ़ा और बिना दाग लगाए जस की तस धर गये। बिता दिए पूरा जीवन फकीरी में । लेकिन आज का युग जनसेवकों का नही चतुर नायकों का युग है जिसमें कहीं जाना हो तो मैली चादर ओढ़कर जाने का रिवाज़ है । स्वच्छ चादर के खतरे अधिक हैं। मैली चादर को कोई खतरा नहीं। दाग भी लगने से पहले बीस बार सोचेगा, लगूँ कि ना लगूँ। इसलिए सत्ता चलाने वाले राजनेताओं पर तो विज्ञापन की यह पंच लाइन एकदम फिट है …..कि दाग अच्छे हैं…।। इतना कहके चौबे जी ने चौपाल अगले शनिवार तक के लिए स्थगित कर दिया ।


चांडाल चौकरी के शब्द-वाण से आहत अन्ना के मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए चौबे जी ने कहा कि ” का जरूरत थी अन्ना बुढऊ को सांप के बिल मा हाथ डालने की,जब बिच्छू के काटे का मन्त्र नाही पता रहा। चार्वाक के ई देश मा और ‘यावत् जीवेत सुखं जीवेत’ वाले युग मा जब भ्रष्टाचार फैशन का रूप ले चुका है तो वहां ई कहके अनशन पर बैठने की का जरूरत थी कि ‘मैया मैं तो जन लोकपाल लायिहौं ‘। अब जब अन्ना और अन्ना के ग्वाल-वाल पर माखन चुराने का आरोप लग रहा है तो तिलमिला के काहे कह रहे हैं कि ‘मैया, मैं नाही माखन खायो’। ज़रा सोचो राम भरोसे कि जवन अन्ना के ऊपर बीस साल से समाजसेवा का भूत सवार है ऊ इतना भी नाही समझ सका कि जुआरियों का अड्डा होत हैं ससुरी राजनीति,जहां वातावरण की पवित्रता कोई मायने नाही रखत । उहाँ झूठ के भी अलग ईमान होत हैं। और तो और उहाँ स्व से ऊंचा चरित्र नाही होत। उहाँ नाप-तौल विभाग के ठेंगा दिखाके सब धन बाईस पसेरी कर दिहल जात है । फिर चोर-चोर मौसेरे भाई एक होई जात हैं । राजनीति बड़ी घाघ चीज होत हैं राम भरोसे,जो समझा नेता और जो नाही समझा ऊ जनता के कैटोगरी में रख दिहल जात हैं । का समझें ?

एकदम्म सही कहत हौ चौबे जी, हम्म तोहरी बात कs समर्थन करत हईं ।जब शंकराचार्य जईसन विद्वान् जगत के मिथ्या कहके चल गईलें तs ऐसे में मिथ्या जगत की सारी चीजें मिथ्या ही हुई नs ! फिर भी पता नाही क्यों, अन्ना और अन्ना की टीम चाहती है कि नेताओं के भाषण और कथन सत्य हों । तुलसीदास के अनुसार जगत सपना है तो सपना मा का झूठ और का सच ? बोला राम भरोसे।

इतना सुनके रमजानी मियाँ ने अपनी लंबी दाढ़ी सहलाई और पान की गुलगुली दबाये कत्थई दांतों पर चुना मारते हुए कहा कि “बरखुरदार, अपना तो बस एक ही फंडा है कि जब जैसा,तब तैसा। ससुरी सच्चाई के अहंकार मा जकडे रहने में कवन बडाई है भईया ! कवन चतुराई है लकीर के फ़कीर बने रहने में ! इसी लकीर के फकीर बने रहने के चक्कर मा महात्मा गांधी मारल गईलें । इसामशीह के सूली पर चढ़ा दिहल गईल बगैरह-बगैरह।हम्म तो बस इतना जानते हैं राम भरोसे भैया कि भारत हो चाहे पाकिस्तान,अमेरिका हो चाहे अफगानिस्तान, सब जगह इहे खिस्सा मशहूर है भैया कि झूठ कहे सो लड्डू खाए, सांच कहे सो मारल जाए ।

वाह-वाह रमजानी मियाँ वाह, का तुकबंदी मिलाये हो मियाँ ! एकदम्म सोलह आने सच बातें कही है तुमने। ई विषय पर अपने खुरपेंचिया जी भी कहते हैं कि समाजसेवियों की निगाह मा जे झूठ है ऊ झूठ राजनीतिज्ञों की नज़र मा डिप्लोमेसी होई जात है ससुरी । काहे कि राजनीति मा झूठ रस से भरे होत हैं -रस की चासनी में सराबोर,मीठे-मीठे,मधुर-मधुर। साक्षात मधुराष्टकम होत हैं । कुछ सिद्धमुख झूठों के झूठ मा हर बार नवलता होत है – क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैती…। यानी कि इनके झूठ रमणीय होत हैं, जेकरा के कोई ‘लेम एक्सक्यूज’ या थोथा बहाना नाही कह सकत। यानी राजनीति मा झूठ ‘असत्यं,शिवं,सुन्दरम’ होत हैं, कहलें गजोधर ।

इतना सुनके तिरजुगिया की माई चिल्लाई -“अरे सत्यानाश हो तू सबका । झूठ कs महिमा मंडित करत हौअs लोगन । इतना भी नाही जानत हौअs कि सत्य परेशान होई सकत हैं,पराजित नाही ।

तोहरी बात मा दम्म है चाची,मगर अब ज़माना बदल गवा है । जईसे डायविटिज के पेशेंट चीनी खाय से डरत हैं,वईसहीं धर्मभीरु लोग अब झूठ के सेवन से कतरात हैं । झूठ मा जे मिठास है ऊ सच मा कहाँ चाची ! विश्वास ना हो तो जाके अपने डिक्की राजा और कपिल मुनि से पूछ लो, बोला गुलटेनवा।

गुलटेनवा की बतकही सुनके चौबे जी गंभीर हो गए और इतना कहके चौपाल अगले शनिवार तक के लिए स्थगित कर दिया कि “बिन पानी के नदी होई सकत हैं,लेकिन बिना झूठ के राजनीति नाही चल सकत ।”


आज चौबे की चौपाल लगी है बरहम बाबा के चबूतरा पर । दीपावली के बाद कुछ सूना-सूना सा है चौपाल । खुसुर-फुसुर के बीच चौबे जी ने कहा कि “आजकल अपने देश मा भ्रष्टाचार के गरमागरम मुद्दे के साथ ससुरा चुनाव सुधारों का मुद्दा भी गरमाने लगा है राम भरोसे । कभी राइट टू रीकाल और कभी राइट टू रिजेक्ट की बात होने लगी है। अपने खुरपेंचिया जी कह रहे थे कि काहे का रिकॉल आऊर काहे का रिजेक्ट, जब ८० प्रतिशत जनता के पास  नाही है कवनो पावर…….अऊर २० प्रतिशत हम नेताओं के पास  है सुपर पावर । तS अईसे में ई सौभाग्य हम सस्ते में कईसे गँवा सकत हईं ? हम्म तो यही कहेंगे कि अईसन-वैसन बात करेवाला मेंटली डिफेकटेड  लोगों को पागलखाने भेज दिया जाए ।दिल खोलकर चांदी के जूते खाया जाए और चोर-चोर मौसेरे भाई एक बनके रहा जाए, अगर  अन्ना-वन्ना टाईप के समाजसेवियों के चेला-चपाटी आँख तरेरे के हिमाकत करे तो उसके ऊपर भी  चप्पल-जूत्ते चलवा के डराया जाए । ना डरे तो साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाया जाए । गुड़ से परहेज रखा जाए और गुलगुले खूब खाया जाए । यानी कि तुम्हारी भी जय-जय,हमारी भी जय-जय । कभी तुम हार जाओ कभी हम्म जीत जाएँ,जईसे भी हो दिवाला हमारा नही,जनता का निकले और हम जनसेवकगण हचक के दिवाली मनाए।”

“सही कहत हौ चौबे जी। आज से 44 साल पहिले फिल्म दीवाना के ई गीत जब मुकेश गईले रहलें तब उनके स्वप्न में भी ई उम्मीद ना रहल होई कि भविष्य मा भारत जईसन लोकतांत्रिक देश खातिर ई केतना मौजू होई । बात-बात मा देश मा राजनितिक दखलंदाजी कवनो अच्छी बात नाही।आंधी कS आम जईसन बार-बार टपक जात हैं अन्ना नेताओं की राह में । अन्ना बुढऊ को देर-सवेर तो यह स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि राजनीति मा भ्रष्टाचार के कई रास्ते हैं। जबतक बकरी दूध देत हैं तबतक राजनीति मा बकरी क दूध से ही काम चल जात हैं और जब बकरिया दूध देना बंद कर देत हैं तS नालियों में और गंदगी के ढेरों पर मटरगश्ती करत सूआरियां काम आई जात हैं। हमको तो लगता है कि हमरे नेताओं की बढ़ती हुई तंदरुस्ती से वे जलने लगे हैं इसीलिए उनका अगेंस्ट करने लगे हैं। का गलत कहत हईं गजोधर भैया ?” बोला राम भरोसे ।

“एकदम्म सही राम भरोसे विल्कुल सोलह आने सच। अब देखो नs पप्पू ने एक सत्ताधारी दल के विरोध मा एगो उपचुनाव में प्रचार कईलें और ऊ पार्टी जे कवहूँ उहाँ से नाही जीती थी इसबार भी हार गई। अब ऊ मुगालते में हैं कि पांच राज्यों में होने वाले अगले विधान सभा चुनाव में हम्म व्यवस्था बदल देंगे। अरे व्यवस्था कवनो तबायफ का गज़रा है का, जे रात में पहनेंगे और सुबह में बदल देंगे। उनके इतना भी नाही मालूम का कि पहिले जनसेवा से नेता बनत रहे अब धन सेवा से बनत हैं। पर बनत हैं जनता के कोर्ट से ही । ऊ कोर्ट जे कवनो ऐब नाही देखत-ऊ कोर्ट जे अच्छे-बुरे में फर्क नाही करत। नतीजा सबके सामने है। जनता उनपर मेहरवान। टिकट बांटे वाला आपन चमचा पर मेहरवान । चमचा पर लक्ष्मी मेहरवान। अभी टिकट पर कुश्ती लड़त हैं-कल जनता के अखाड़े मा लडिहें। हराम की कमाई पानी की तरह बहईहें। हलाल की कमाई गाँठ मा दबाये रहिहें। विरोधियों के सफ़ेद पानी पी-पी के कोसिहें आ इलेक्सन के बाद उहे ढ़ाक के तीन पात यानी चोर-चोर मौसेरे भाई ।” बोला गजोधर ।

यह सब सुनकर रमजानी मियाँ की दाढ़ी में खुजली होने लगी।पान की पिक पिच्च से फेंक के अपनी लंबी दाढ़ी सहलाते हुए फरमाया कि “बरखुरदार,क्या पते की बात कही है हैरत तो इस बात की है गजोधर कि हम्म ऐसे नेताओं पर भरोसा करते हैं जो किसी पर भरोसा नही करते। हर पल झूठ बोलना जिनकी फितरत मा शामिल है । हर पल धोखा देना जिसकी आदत है । उनपर हमारी मेहरवानी क्यों ? क्यों ऐसे नेताओं को हम आगे बढ़ा रहे हैं ? क्यों उनका महिमा मंडन कर रहे हैं ? क्यों हम सुधर नही रहे हैं ? हम्म तो बस दुष्यंत साहब के तेवर में यही कहेंगे कि – आप बचकर चल सकें,ऐसी कोई सूरत नही। रहगुजर घेरे हुए,मुर्दे खड़ें हैं बेशुमार।।”

“बाह-बाह क्या शेर पटका है मियाँ, इस शेर पर एक सबाशेर मेरी ओर से भी, अर्ज़ किया है कि- आज मेरा साथ दो,वैसे मुझे मालूम है।पत्थरों में चीख हरगिज कारगर होती नही।” गुलटेन कहलें।

इतना सुन के तिरजुगिया की माई चिल्लाई कि “चौबे जी ई अन्ना और केजरीवाल लाख चिल्लाए, हमको नही लगता कि वास्तव में बदलेंगे सारे सपने ?”

सही कहत हौ। हम्म तोहरी बात कs समर्थन करत हईं,लेकिन जेके दर्द होत है,उहे रोवत हैं तिरजुगिया की माई। इतना कहके चौबे जी ने चौपाल अगले शनिवार तक के लिए स्थगित कर दिया।


आज चौबे जी की चौपाल लगी है राम भरोसे की मडई में । चटकी हुई है चौपाल । चुहुल भी खुबई है । घर के उहार की ओर खुले बरामदे में पालथी मार के बैठे हैं चौबे जी महाराज और सुना रहे हैं खिस्सा,कि कैसे भारत मा दिवाली पोपुलर हुई । कह रहे हैं क़ि “एकबार की बात है,स्वर्ग मा इन्द्र के निरंकुश शासन से उबके देवता लोग इन्द्र की जगहिया पर दोसर देवराज बनाबे के सोचत रहलें । मगर देवता लोग देवराज खातिर एगो कवनो देवता के नाम पर सहमत ना भईलें । काहे कि सब देवता के मन में देवराज बने के लालसा दबल रहे । ई समस्या से बाहर निकाले की जिम्मेदारी दिहल गईल नारद के । नारद कहलें कि अब समय आ गया है कि स्वर्ग में भी प्रजातंत्र की नींब डाल दी जाए और निष्पक्ष चुनाव खातिर पार्यवेक्षक विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र से लाया जाए । सारे देवता सहमत हो गए । नारद जी के पहल पर रातो-रात भारत से एक सत्ताधारी नेता को  उठाके स्वर्ग में मांगा लिया गया और उन्हें यह फरमान सुनाया गया कि पृथ्वी के जईसा यहाँ भी प्रजातंत्र लागू कराया जाए । चुनाव की प्रक्रिया शुरू भईल । शुरुआत में दुई गो पार्टी बनल एक ‘स्वर्ग देवबादी पार्टी’ और दोसर  ‘स्वर्ग कल्याण परिषद्’ ।  जब दूनू पार्टी के अध्यक्ष बने के बारी आईल तS देवता लोग आपन-आपन उपहार लेके नेता जी के पास पहुँचलें । उपहार प्राप्त कईला के बाद नेता जी स्वर्ग देवबादी पार्टी के अध्यक्ष वरुण के तथा स्वर्ग कल्याण परिषद् के अध्यक्ष कुबेर के बनवा दिहलें । काहे कि देवता सब के उपहार में वरुण तथा कुबेर के उपहार ज्यादा कीमती रहे । देवता सब के चुनाव प्रचार में भिडाके नेता जी पहुंचे क्षीर सागर  जहां लक्ष्मी जी विष्णु को पाँव दबाती मिल गई । नेता जी दु;ख भरे स्वर में बोले कि हे माते, यह कैसा स्वर्ग है जहां नारी का सम्मान नही ।  नेता जी की बात से लक्ष्मी प्रभावित हुई और बोली हे पुत्र , तुम्हीं बताओ कि स्वर्ग के देवता से हम अपना अधिकार कैसे प्राप्त करें ? नेता जी कहलें कि माता पहिले हवाला फिर निबाला । लक्ष्मी जी पूछीं कि ये हवाला क्या होता है बच्चा । नेता जी ने कहा हवाला का मतलब है कृपा द्रष्टि का बायपास यानी फर्जी नाम से स्विस बैंक मा पईसा के स्थानान्तरण । लक्ष्मी जी ने कहा एवमस्तु …अब बताओ उपाय । नेता जी ने मुस्कुराके लक्ष्मी को सलाह दी कि हे माते हमारे देश में लोकतंत्र का एक नज़ारा आजकल खुबई सफल है कि पार्टी का अध्यक्ष बन जाया जाए और प्रधान मंत्री की कुर्सी किसी विश्वासपात्र उल्लू को दे दिया जाए । ताकि भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्ति भी मिलती रहेगी और जब भी इच्छा होगी उसके स्थान पर किसी और उल्लू को बैठा दिया जाएगा ।लक्ष्मी जी को खुश करने के बाद नेता जी पहुंचे सरस्वती के शरण में कहलें क़ि हे माते, आपको कछु मालूम है क़ि नाही ? सरस्वती जी ने अनभिज्ञता जाहिर की तो नेता जी ने कहा क़ि आपके लिए बहुत ही मनहूस खबर है …बात ई है क़ि लक्ष्मी जी औरतन पर श्रेष्ठता हासिल करे के खातिर एगो पार्टी बनायी है । इतना सुनत सरस्वती जी आपनी वीणा पटकी और गुस्सा से लाल-पियर होके स्वर्ग की तरफ भागी । एकरा बाद नेता जी कैलाश पर्वत पहुचलें जहां भोला बाबा चिलम मा गांजा भरके सुरकत रहलें  । नेता जी भोला बाबा के प्रणाम करके कहलें क़ि ओ बौरहवा बाबा आप  यहाँ गांजा-भांग पी के मस्त हैं और उधर आपके परम भक्त इंद्र को स्वर्ग से हटाने की तैयारी चल रही है । स्वर्ग मा प्रजातंत्र लागू हो जाई तS आपके इज्जत का रही ? इतना सुनते ही भोला बाबा ने त्रिशूल उठा लिया । थोड़ी देर में स्वर्ग के दृश्य बदल गए । सब देवता एक-दूसरा से लड़े लागल । सुनहरा मौक़ा देख के नेता जी कुबेर के खजाना पर हाथ साफ़ करके नौ दो ग्यारह हो गए ।इसप्रकार स्वर्ग मा प्रजातंत्र का प्रयोग असफल हुआ और इस ख़ुशी में नेता,अफसर,व्यापारी मिलके मिलावट के बल पे रिकॉर्ड तोड़ दिवाली मनाई। स्वर्ग के देवताओं को भी उल्लू बनाने वाले उल्लू जी के स्वागत खातिर ऐसी दिवाली मनी भारत मा कि मोस्ट पोपुलर हो गई। तभी तो दिवाली में अच्छे-अच्छों का दिवाला निकल जाता है और उल्लूओं की बल्ले-बल्ले हो जाती है । का समझे ?

हम्म तो समझ ही गए महाराज लेकिन स्वर्ग के देवता लोग भी भारत के उल्लूओं से खार खा गए होंगे । इसी लिए तो हमरे देश मा ई परिपाटी चल रही है क़ि नेता करे न चाकरी, अफसर करे ना काम …जुआ खेलके मस्त है बाबू राजा राम । बोला राम भरोसे ।

तभी बीच में टपक पडा गजोधर और बोला “महंगाई से त्रस्त हमनी आम जनता खातिर  दिवाली ‘कंगाली में आटा गीला’ करने जैसी है राम भरोसे । महंगाई की वजह से त्योहारों की खुशी कहीं खो गई है ससुरी । सभी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं। घर का बजट गडबडाने लगा है।खो गई है गरीबों की मनमोहनी मुस्कान। करें भी तो क्या करें। बढ़ती मंहगाई ने अमीर व गरीब के बीच की खाई को और गहरा कर दिया है। आज अमीर और अमीर हो रहा है, ऐसे में वो तो महंगी से महंगी चीज बड़ी आसानी से खरीद सकते हैं लेकिन इस महंगाई के दौर में गरीब आदमी की तो मन गई दिवाली…वो तो सिर पकड़कर बैठ जाता है कि दिवाली कैसे मनाए और अगर किसी तरह गरीब इंसान मंहगाई से बच भी जाये तो नकली मिठाई, नकली पटाखे आदि आपका दीवाला निकाल देंगे और रही-सही कसर प्रदूषण और शराबी लोग पूरी कर देंगे।”

एकदम्म सही कहत हौ गजोधर भैया, हम्म तोहरे बात कS समर्थन करत हईं ।चावल में कंकर की मिलावट , लाल मिर्च में ईंट – गारे का चूरन, दूध में यूरिया , खोया में सिंथेटिक सामग्रियाँ , सब्जियों में विषैले रसायन की मिलावट और तो और देशी घी में चर्वी, मानव खोपडी, हड्डियों की मिलावट क्या आपकी किश्तों में खुदकुशी के लिए काफी नहीं ?भाई साहब, क्या मुल्ला क्या पंडित इस मिलावट ने सबको मांसाहारी बना दिया , अब अपने देश में कोई शाकाहारी नहीं , यानी कि मिलावट खोरो ने समाजवाद ला दिया हमारे देश में , जो काम सरकार चौंसठ वर्षों में नहीं कर पाई वह व्यापारियों ने चुटकी बजाकर कर दिया ,यानी कि हम रहे निठल्ले के निठल्ले और हो गयी ऊल्लूँ की बल्ले-बल्ले । दिवाली मा ना लड्डू ना भगवान की,जय बोलो बईमान की।बोली तिरजुगिया की माई ।

इतना सुनकर रमजानी मियाँ ने पान की गुलेली मुह मा डालते हुए अपने कत्थई दांतों पर चुना मार के कहा कि ” बरखुरदार एक शेर फेंक रहा हूँ विल्कुल मौजू है कि जाने कैसे कैसे लोग ऐसे वैसे हो गये जाने ऐसे वैसे लोग कैसे कैसे हो गये। चौबे  साहब, आपने तो मुद्दे उठा दिए मगर समाधान नहीं बताया, चलिए समधान मैं बता दे रहा हूं । वाणी माधुर हो, विचार हों शुद्ध,सबके हो मन में ईशा, राम ,बुद्ध,न मिलावाट हो और न बनावट हो,हर कोई मुस्कुराए बच्चे या वृद्ध ।इस दिवाली मा अनैतिकता को ढिबरी में जलाके एक नयी परंपरा बनाते हैं और  बोलते हैं ज़ोर से, चक दे इंडिया ।”

विल्कुल सही फरमाए हो रमजानी मियाँ…एक तो गरीबी की मार , ऊपर से मिलावट का तांडव । मिलावट खोरो ने कुछ भी ऐसा संकेत नही छोड़ रखा है जिससे पहचान की जा सके की कौन असली है और कौन नकली ? ऐसे में  किसकी दिवाली? कैसी दिवाली ? इतना कहकर  चौबे जी ने चौपाल को अगले शनिवार तक के लिए स्थगित कर दिया ।