ब्लोगोत्सव-२०१०

हिन्दी साहित्य को अमर उपन्यास देने वाले फणीश्वर नाथ रेणू के बहुचर्चित आंचलिक उपन्यास “मैला आँचल ” में फाग गीत अथवा ऋतुगीत के नाम से गाये जाने वाले लोक गीतों का बड़ा ही मार्मिक व् सटीक उपयोग हुआ है, जिसमें से एक है कान्हा के रंगीले मोहक मिजाज का मोहमय वर्णन , जो इस प्रकार है “अरे बहियाँ पकडि झकझोरे श्याम रे
फूटल रेसम जोड़ी चूडी
मसुकी गयी चोली भिंगावल साडी
आँचल उडि जाए हो
ऐसी होरी मचायो श्याम रे ….!”

मैला आँचल में एक पात्र है फुलिया जिसने रमजू की स्त्री के आँगन में खलासी जी से भेंट करके कहा था कि “इस साल होली नैहर में ही मनाने दो ” मन की मस्ती भरी इस इच्छा को गीत के रूप में इस प्रकार उडेला गया है –


“नयना मिलानी करी ले रे सईयाँ
नयना मिलानी करी ले
अब की बेर हम नैहर रहिबो
जो दिल चाहे सो करी ले ……!”


आईये एक ऐसे कवि की चर्चा करते हैं जिन्होंने हिन्दी साहित्य को गीत विधा का नया रूप ही नही दिया अपितु गीत के माध्यम से हिन्दी साहित्य को नया आयाम भी दिया , नाम है गोपाल सिंह नेपाली जिन्होंने होली पर अपनी अभिव्यक्ति कुछ इस प्रकार दी है –
 
 

” बरस-बरस पर आती होली,
रंगों का त्यौहार अनूठा
चुनरी इधर, उधर पिचकारी,
गाल-भाल पर कुमकुम फूटा
लाल-लाल बन जाते काले ,
गोरी सूरत पीली-नीली ,
मेरा देश बड़ा गर्वीला,
रीति-रसम-ऋतु रंग-रगीली ,
नीले नभ पर बादल काले ,
हरियाली में सरसों पीली !”


यह गीत उन्होंने वर्ष १९५७ में लिखी , जो आज भी प्रासंगिक है । कविवर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने फागुन का वर्णन कुछ इस प्रकार किया है –

 


“सखि, बसंत आया ।
भरा हर्ष बन के मन ,नवोत्कर्ष छाया ।
किसलय-वसना नव-वय लतिका
मिली मधुर प्रिय -उर तरु पतिका ,
मधुप -वृन्द वंदी पिक-स्वर नभ सरसाया ।
सखि,बसंत आया । “

वहीं डा० हरिवंश राय बच्चन की नज़रों में होली ऐसी है-
 
 

“एक बरस में एक बार ही
जगती होली की ज्वाला ,
एक बार ही लगती बाजी,
जलती दीपो की माला,
दुनिया वालों ,किंतु किसी दिन
आ मदिरालय में देखो ,
दिन को होली , रात दिवाली ,
रोज मनाती मधुशाला !”


इस सन्दर्भ में राष्ट्रकवि दिनकर का अंदाज़ कुछ अलग हटाकर है :


लौट जाता गंधवह सौरभ बिना फिर-फिर मलय को,
पुष्पषर चिंतित खडा संसार के उर की विजय की ,
मौन खग विस्मित- ” कंहा अटकी मधुर उल्लास वाली !
मैं शिशिर – शीर्णा चली , अब जाग ओ मधुमासवाली !!

मुक्त करने को विकल है लाज की मधु-प्रीति  कारा,
विश्व – यौवन की        शिरा में नाचने को रक्तधारा,
चाहती छाना दृग में आज तजकर गाल लाली !
मैं शिशिर – शीर्णा चली , अब जाग ओ मधुमासवाली !


!!मस्ती !!

() () आनन्द विल्थरे

वसंत के 
विस्तरे पर लेटा फागुन 
मेरे भी दिल में 
आग भड़का रहा है 
काश, हम उसे 
समझा पाते
कि गीली बारूद के पीछे
मिहनत  करने से कोई
लाभ नहीं है,
लेकिन वह तो 
अपनी ही धुन में
भर-भर कटोरे
मस्ती छलका रहा है !
()()()


गजानन सिंह ‘नम्र’ बसंत का स्वागत करते हुए कुछ इसतरह बयान करते हैं :


आम्र के श्रृंगार में, नीर के आगार में,
तारों की बरात में, उजाला वसंत है !
उषा की ललाई में, रवि अरुणाई में ,
शशि अंगराई में, निखारा वसंत है !

 

जीवन संगीत में, मानव की प्रीत में
भ्रमरों के गीत में, बिखरा वसंत है!

नवल आकाश में, कोमल सी घास में,
मन के विशवास में,  लहरा वसंत है !



क्या सचमुच हमारी भावनात्मक एकता कमजोर हो रही है ?

बृहस्पतिवार, २३ दिसम्बर २०१०

नि:संदेह भारत ने एक संप्रभुता संपन्न राष्ट्र के रूप में बड़ी-बड़ी उपलब्धियां प्राप्त की । आई टी सेक्टर में दुनिया में उसका डंका बजा । चिकित्सा,शिक्षा, वाहन, सड़क, रेल, कपड़ा, खेल, परमाणु शक्ति, अंतरिक्ष विज्ञान आदि क्षेत्रों में बड़े काम हुए । परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र का रुतवा भी हासिल हुआ । तेजी से यह देश आर्थिक महाशक्ति बनने को अग्रसर है । मगर राष्ट्र समग्र रूप से विकसित हो रहा है इस दृष्टि से विश्लेषण करें तो बहुत कुछ छूता हुआ भी मिलता है, विकास में असंतुलन दिखाई देता है एवं उसे देश के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचाने में सफलता नहीं मिली है । जिससे भावनात्मक एकता कमजोर हो रही है , जो किसी राष्ट्र को शक्ति संपन्न , समृद्धशाली,अक्षुण बनाए रखने के लिए जरूरी है । यह समस्या चिंता की लकीर बढाती है ।

हमारे देश में इस वक्त दो अति-महत्वपूर्ण किंतु ज्वलंत मुद्दे हैं – पहला नक्सलवाद का विकृत चेहरा और दूसरा मंहगाई का खुला तांडव । जहां तक ब्लॉग पर प्रमुखता के साथ मुद्दों को प्रस्तुत करने की बात है, इस वर्ष प्रमुखता के साथ छ: मुद्दे छाये रहे हिंदी ब्लॉगजगत में । पहला बिभूती नारायण राय के बक्तव्य पर उत्पन्न विवाद, दूसरा नक्सली आतंक,तीसरा मंहगाई,चौथा अयोध्या मामले पर कोर्ट का फैसला,पांचवां कॉमनवेल्थ गेम में भ्रष्टाचार और छठा बराक ओबामा की भारत यात्रा ।इन्हीं छ: मुद्दों के ईर्द-गिर्द घूमता रहा हिंदी ब्लॉगजगत पूरे वर्ष भर ।कौन-कौन से मुद्दों पर हिंदी ब्लॉगजगत ने कैसी रणनीति बनायी, सार्वजनिक रूप से क्या कहा और भ्रष्टाचार आदि मुद्दों पर क्या प्रतिक्रिया रही हिंदी ब्लॉग जगत की, जानने के लिए चलिए चलते हैं परिकल्पना पर जहां आजकल वार्षिक हिंदी ब्लॉग विश्लेषण प्रकाशित किये जा रहे हैं –