नई दिल्‍ली से सुषमा सिंह की एक विस्‍तृत रपट रविवार दिनांक 8 मई 2011 के दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ में पेज 19 पर प्रकाशित।
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बुधवार, १० अगस्त २०११

मेरी धार विलक्षण है ….. कभी भी समस्या को समस्या नहीं रहने देता , अंतर्द्वंद बन कई पगडंडियों का निर्माण करता जाता हूँ , फिर निर्णय बन एक रास्ता निकलता हूँ …. मैं हौसला हूँ , मैं काल हूँ , मैं सरगम हूँ , मैं प्रेम हूँ – तुम पर है …. मुझे जिस राग में उठा लो . मनःस्थिति मैं बनाता हूँ … तुम झूठे हो तो मैं सिद्ध करता हूँ , तुम सत्य हो तो हर आग से गुज़ारकर कुंदन बनाता हूँ ….
 
आज हमारे साथ अनुभवों की कमान लिए डॉ0 विजय कुमार शुक्ल ‘विजय’ जी है …
वह ही युवा है

भेद कर दुर्भेद्य धर्मावरण,
जो दे सके इंसानियत का सुबूत
वह ही युवा है।।
 
जब मान्यतायें रूढ़ियों में बदल जायें,
कभी की काल-सम्मत प्रथाएं
बदलते वक्त में अजगर सी जकड़ जायें,
क्षण-क्षण बदलते वक्त की आवाज
गुज़रे वक्त की खांसियों में दब जायें,
जो सिरे से इनको नकारे और करदे
इक नई शुरुआत
वह ही युवा है।।
 
भोग करके भोग में जो लिप्त न हो,
सत्य-सेवा का वरण करके कभी
इस दम्भ से विक्षिप्त न हो,
‘मार्ग कितना ही कठिन हो आगे बढ़ेंगे’
इस फ़ैसले के बाद कोई
फ़ैसला अतिरिक्त न हो,
‘दर्द सबका दूर करना धर्म मेरा’
इस भावना से जो भरा हो
वह ही युवा है।।
 
जिसके क़दम प्रतिक्षण मचलते हों
किसी प्रयाण को, दर्दान्त
पर्वत-श्रेणियों पर जो थिरकते,
गतिमान करते पाषाण को,
उफनते सिन्धु पर
अठखेलियों में जो मगन हो,
गति नहीं, अवरुद्ध जल हो,
धरा हो, गगन हो,
उल्लास से भरपूर प्रतिक्षण,
हर परिस्थिति में जो मुस्कुराए
वह ही युवा है।।
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अन्तर्द्वन्द्व
 
व्यक्ति का हर कर्म मूलाकार में,
क्या वासनाओं का स्फुरण है?
पल-पल छीजते जुड़ते
अहंकारों के गगन में
क्या ग़लत है? क्या सही है?
न्याय क्या? अन्याय क्या?
सम्मान क्या? अपमान क्या?
इन विचारों का पनपना
गुंझनों के सुलझने का
क्या पहला चरण है?
 
जब विरोधों की चुभन
कुछ रास सी आने लगे,
जब पुराने अनुभवों की तिलमिलाहट
मन्द पड़कर मन को बहलाने लगे,
क्या समझ लूँ ओज घटता जा रहा है?
या निरन्तर बढ़ रहे वय का वरण है?
 
जब आघात पर प्रतिघात
करने का न मन हो
विद्रूप बोझिल अट्टहासों की प्रतिध्वनि,
मन्द सी मधुस्मित सुमन हो,
चिलचिलाती धूप भी
जब छाँव सी भाने लगे,
दर्द की हर टीस से
जब हृदय गुनगुनाने लगे,
क्या समझ लूँ धार अब
तलवार की मुरदा रही है?
या हृदय में अहिंसा-भाव
का यह अवतरण है?
 
भावनाओं की नुकीली
चोटियां शान्त होकर
जब पठारों सी लहराने लगें,
प्रतिक्रियाओं की लपकती तीव्रता
उन्माद से बचकर निकल जाने लगे,
कुछ पुरानी दो टूक बेबाकियों से
स्वयं ही जब शरम आने लगे,
पूर्ण अवसर प्राप्त होने के अनन्तर
वार करने से जब मन कतराने लगे,
क्या समझ लूँ डोर

 चिंतन का अस्तित्व

चिंतन का अस्तित्व व्यापक है , बिना चिंतन मार्ग चयन संभव नहीं …. व्यंग्य हो आवेश हो …. पर चिंतन हो , समय यानि मैं तभी बदलता हूँ !
मुखातिब हों आशुतोष जी के इस चिंतन से और देखिये बातों में आग कितनी है, उसकी आँच कितनी है !
 
अपने बच्चों को सुनाओगे ये लोरियां भी क्या
 
अपने बच्चों को सुनाओगे ये लोरियां भी क्या
अपने बच्चों को सुनाओगे ये कहानियां भी क्या
अपने बच्चों को कैसे भला बहलाओगे यहाँ
हाल बिगड़े हुए देश के सुनाओगे भी क्या
कैसे कहोगे के बच्चों ये सूनी जागीर है
कंचन वाली धरती हो गयी बच्चों फकीर है
कैसे कहोगे ये सीने पे हाथ रखकर
देखो बेटा कैसी प्यारी ये तस्वीर है बच्चों
पेड़ के तले लेती हुई तस्वीर शेर की
जंगल होते थे कभी ये जागीर शेर की
हमने अपने लिए जंगलों को काट लिया था
पत्ता जड़ तना शाख सब बाँट लिया था
और सजाने के लिए ड्राइंग रूम घर का
हमने जंगल के राजा को भी मार दिया था
देखो बेटा तस्वीर मस्त मौला हाथी की
मस्त मौला हाथी की मस्त मौला साथी की
हमने इनके दांतों से अपना श्रंगार किया था
इनके दांतों के लिए ही इन्हें मार दिया था
देखो बेटा तस्वीर अब गेंडा बिशाल की
बोली लग गयी थी कभी यहाँ इनकी खाल की
इसके सींग ने इसे ही बर्बाद कर दिया
भोले -भाले जीव को यहाँ तबाह कर दिया
देखो बेटा सैकड़ों हैं ये तस्वीरें तभी की
भालू चीता बाघ लोमड़ी लंगूर सभी की
हमने इनकी खालों से अपना श्रंगार किया था
इन्हें मारा काटा इनका व्यापार किया था
 
उनसे कहना हमने गंगा को भी काला कर दिया
बड़ी बड़ी नदियों को भी हमने नाला कर दिया
बच्चे देखेंगे जो बहती हुई खून की नदी
कैसे मानेंगे की बहती थी दूध की नदी
बकरी भेड़ों सबको तबाह कर दिया
उनकी बोटी बोटी कटी निर्यात कर दिया
उनसे कहना देखो बेटा गेंहू दाल के दाने
बच्चों को शायद तुम्हारे लगे ये भी अनजाने
इनके लिए यहाँ होने लगी कालाबाजारी
राशन दुकानों पे होने लगी मारामारी
अपने बच्चों को दिखाना तस्वीर गेहूं की
उनसे कहना कभी खाते थे हम रोटी इनकी
 
मैंने सोचा कुछ और ही सिखाऊंगा उन्हें
पैड होते AK47 थमाऊंगा उन्हें
दूंगा उनको अब तालीम अब इसको चलाने की
इस माँ के लिए मिट जाने की मिटाने की
उनसे कह दूंगा अन्याय का प्रतिकार करना है
सह चुके आज तक नहीं और सहना है
माँ का आँचल कहें को कोई फाड़ रहा हो
गहरी जडें इस देश की उखड रहा हो
हल्दी में मिला के बेंचे गर पीली हो मिटटी
घी के नाम पे जो बेचे पशुओं की चर्बी
औरत की अस्मिता को कोई रौंद रहा हो
माँ का आँचल कहीं जो कोई खौंद रहा हो
बच्चों क़र्ज़ देश का सारा उतार देना तुम
इन जाहिलों को खुले आम मार देना तुम
अपने बच्चों को सुनाऊंगा मैं लोरियां यही
अपने बच्चों को सुनाऊंगा कहानियां यही
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बच्चे भी अब अपना फर्ज निभा रहे हैं
 
एक दिन जब शाम को थककर घर लौटा
मैंने बड़े प्यार से अपनी बिटिया को बुलाया
उससे एक गिलास पानी मंगवाया
बिटिया ने दी अपने तमाम कामों की दुहाई
दुनिया भर की बातें बताईं
पर पानी नहीं लायी
एक दिन फिर मैंने अपने बेटे को भी आजमाया
उसे भी प्यार से बुलाया
अपने दुखते सर का देकर हवाला
मैंने कह डाला
बेटा जरा सर दबा दो
हो सके तो बाम भी लगा दो
बेटा बहुत झुंझलाया
कई कोने का मुंह बनाया
पर सर नहीं दबाया
यह देखकर फिर कुछ सोचकर
मैंने ठहाका लगाया
फिर मुस्कुराया
यह देखकर मौके पर मौजूद ;
मेरे मित्र सकते में आया
उसने एक सवाल उठाया
गुस्से की बात पर गुस्सा नहीं दिखा रहे हो
मुस्कुराना नहीं था मुस्कुरा रहे हो
इस रहस्य से पर्दा उठाओ
जल्दी से माजरा बताओ
मैंने कहा तो फिर सुनते जाओ
मैं समझता था सिर्फ हम फर्ज निभा रहे हैं
आज खुशी से मेरा दिल भर आया है
जबसे गूढ़ रहस्य समझ आया है
कि बच्चे भी अब अपना फर्ज निभा रहे हैं
हम उन्हें उनके पैरों पे और ..
और वो हमें हमारे पैरों पे
खड़ा होना सिखा रहे हैं!!

देर है अंधेर नहीं

मैं अनिल जी के चौखट पर कई बार गया … भावनाएं थीं , पर बाड़ नहीं लगे थे… हवाएँ थीं , नमी थी पर सिंचन में कमी थी …. आज कुछ विराम के बाद मैं वहाँ गया और देखा फसलों में एक अंकुरण है , जो कह रहे हैं ‘ देर है अंधेर नहीं ‘… आइये मेरी सच्चाई का आकलन कीजिये ,
 
मैं कहता हूँ …
 
लोग कहते हैं… क्यूँ
बेतरतीब सा रहा करते हो?
लोग अपने संग हुजूम ज़माने सा लगाते हैं
तुम क्यूँ दोस्त बनाने से डरते हो ?
मैं कहता हूँ – मैं खुश न रहूँ खुद से तो न !
 
कहा करते हैं सब
अंडर सेट्स कपडे क्यूँ नहीं पहना करते तुम ?
शकल अच्छी न सही, कम से कम
लोगों की नक़ल तो ठीक से कर लो
मैं कहता हूँ – नक़ल तो कर लेता मगर मैं, मैं बचूं तो न
 
अक्सर झेलनी पड़ती है
तमाम मेरी आदतों की खिलाफत
घर से बाहर तक
क्यूँ ये नहीं, क्यूँ वो नह ?
मैं कहता हूँ मैं ऐसा ही हूँ
 
लोग उदहारण दिया करते हैं लोगों की ..
सुझाव बहुत सारे
हर वक़्त मेरे कानों की चैन छीन लिया करते हैं
मैं कहता हूँ मैं ठीक हूँ जो ..
अभी की तरह नहीं हूँ
कम से कम जो हूँ.. वो दीखता तो हूँ ..
घिन आती है रंगे सियारों से
सफेदपोशों की दकियानूसी विचारों से
 
मुझे रहने दो मुझ सा ही
मैं बहुत खुश हूँ मैं जैसा भी हूँ..
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कलम मेरी..
 
रोज चलती है कलम मेरी
तेरी ही वजह सिर्फ
तय करके चंद रास्ते मगर
कलम मेरी
ठिठक जाती है, ठहर जाती है
 
गर.. किस्सा शुरू करता हूँ कोई और
लिखने को सिर्फ
नई एक दास्ताँ पूरी भी नहीं होती
एक अधूरी दास्ताँ.. पूरी की पूरी
आँखों से होकर गुजर जाती है
 
फिर ….
कलम मेरी सहमकर..
ठिठक जाती है, ठहर जाती है
 
कुछ नया खुशनुमा
रचना चाहती है मेरी कलम
तरस जाती है खुशियों को
नहीं मिलती चाहकर भी
 
स्याही की औकात कहाँ ?
कागजों पर आंसुओं की
बेतरतीब बूँदें उभर जाती हैं
 
फिर …..
कलम मेरी सहमी सी
किसी कोने में रहती है घंटों
कोशिश करता हूँ मनाने को
मगर लिखने को मुकर जाती है
 
और भी रोता हूँ
जब लिख नहीं पाता
जब कलम मेरी डर जाती है
आदतों के खिलाफ…
कलम मेरी ठहर जाती है
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मुझे कवि न समझे..
 
नन्हीं सी हाथों में
पकड़ कर कलम करची की
लिखा पहला कौन सा अक्षर, ख्याल नहीं
 
मगर याद है.. तब भी, अब भी
महज खुश करने को नहीं
अपनी अभिव्यक्ति में
नए रंग भरने को भी
शब्दों को सुरमयी बनाने की कोशिश की हमने
 
गीत बनी या गजल,
कागज़ की आयतों पर
कीचड दिखी या कमल
ये तो सौदागर जाने शब्दों के
 
मैं तो वही लिखता हूँ बस
जो मेरी यादों में बसी जाती है
बयां वही करता हूँ हर्फों की दुआ से
जा कभी बनके कहानी
मेरी आँखों से बही जाती है
 
टिमटिमाते दूर गगन में ओझल सा
तारा हूँ मैं तारा…
कोई मुझे रवि न समझे