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बृहस्पतिवार, 31 मई 2012

परिवार की पत संभाले, वही है पत्नी..!!


परिवार की पत संभाले, वही है पत्नी..!!(इज्जत)
(Courtesy Google images)

प्रिय मित्र,
 
एक बार, एक पति देव से किसी ने सवाल किया,"पति-पत्नी के बीच विवाह - विच्छेद होने की प्रमुख वजह क्या है?"
 
विवाहित जीवन से त्रस्त पति ने कहा,"शादी..!!"
 
हमें तो इनका जवाब शत-प्रतिशत सही लगता है.!!
 
मानव नामक नर-प्राणी,  वयस्क होते ही, अपना जीवन साथी पसंद करने के बारे में, अपनी बुद्धिमत्ता और समझदारी से,कुछ ख्याल को पाल-पोष कर,उसके अनुरूप किसी नारी के साथ विवाह के बंधन में बंध जाता है । 

फिर आजीवन ऐसी गलतफ़हमी में जीता है कि, मेरी पत्नी, मेरे उन ख्याल के अनुरूप, बानी-व्यवहार अपना कर,सहजीवनका सच्चा धर्म निभा रही है..!!
 
पर, सत्य हकीक़त यही होती है कि, विवाह के पश्चात, पति देव के ख्यालात आहिस्ता-आहिस्ता कब बदल कर पत्नी के रंग में रंग जाते हैं,पता ही नहीं चलता..!!
 
वैसे, अगर कोई पति अपने सारे विचार पत्नी के विचारों से एकाकार कर दें, इसमें कोई बुराई नहीं है ..!! पर हाँ, पत्नी के अलावा, परिवार के बाकी सदस्य को, अपने बेटे-भाई के ऐसे भोलेपन पर एतराज़ ज़रूर हो सकता है?
 
हालाँकि, पति देव के मुकाबले, जगत की सभी पत्नीओं की, छठी इंद्रिय (sixth sense) बचपन से ही, जाग्रत होने की वजह से, वह ये बात अच्छी तरह जानती हैं कि, विवाहित जीवन सुखद बनाने के लिए, पति को समझने में ज्यादा समय व्यतित करना चाहिए और  उसे प्यार करने में कम से कम..!!
 
इसी तरह, पति देव भी, अपने नर-प्राणी होने की गुरूताग्रंथी से ग्रसित होकर, शादी के बाद थोड़े ही दिनों में समझ जाता है कि, विवाहित जीवन सुखद बिताने के लिए, पत्नी को प्रेम करने का दिखावा करने में ज्यादा समय देना चाहिए और उसे समझने के लिए कम से कम..!! (जिसे बनाने के बाद, खुद ईश्वर आजतक समझ न पाया हो, उसे कोई पति क्या ख़ाक समझ पाएगा?)
 
इसीलिए,ऐसा कहा जाता है कि, जीवन में दो बार आदमी, औरत को समझ नहीं पता,(१) शादी से पहले (२)शादी के बाद..!!
 
पत्नी को समझने में अपना दिमाग ज्यादा खर्च न करने के कारण ही, विवाहित पुरूष,किसी कुँवारे मर्द के मुकाबले ज्यादा लंबी आयु बिताते है, ये बात और है कि, विवाह करने के बाद, ज्यादातर पति देव (मर्द) लंबी आयु भुगतने के लिए राज़ी नहीं होते..!!
 
हिंदुस्तान में पत्नी की परिभाषा |
 
भारत में हिंदु धर्म के अनुसार, `पत्नी` ऐसी नारी है, जो अपने पति के साथ, अपनी पहचान सहित, घर संसार के सभी विषय,चीज़ में,समान अधिकार रखती हो,जीवन के निर्णय एक दूसरे के साथ मिलकर करती हो,अपने परिवार के सभी सदस्य के आरोग्य,अभ्यास एवं अन्य ज़िम्मेदारी का वहन करती हो ।
 
हमारे देश में करीब, ९० % विवाह,पति-पत्नी के दोनो परिवारों की सहमति से  (Arranged Marriages) किए जाते हैं । जिस में धर्म,जाति,संस्कृति और एक जैसी आर्थिक सक्षमता-समानता को ध्यान में रख कर, ये विवाह संबंध जोड़े जाते हैं।

सन-१९६०-७० के दशक तक तो, भारत के कई प्रांत में,घर के मुखिया की पसंद के आगे, नतमस्तक होकर, हाँ-ना कुछ कहे बिना ही विवाह करने का रिवाज़ अमल में था । हालाँकि, ऐसे रिवाज़ के चलते कई पति-पत्नी आज भी मन ही मन अपना जीवन, किसी बेढंगी बैलगाडी की रफ़्तार से, मजबूर होकर, बेमन से संबंध निभा रहे होंगे..!!
 
मुझे सन-१९५८ का एक,ऐसा ही किस्सा याद आ रहा है, हमारे गुजरात के एक गाँव में, किसी कन्या को देखने के लिए गए हुए,एक युवक और उसके माता पिता को, भोजन का समय होते ही, कन्या के माता-पिता ने, मेहमानों को भोजन ग्रहण करने के लिए प्रेमपूर्वक आग्रह किया, जिसे मेहमान ठुकरा न सके । उधर  कन्या के परिवार को लगा कि, विवाह के लिए सब राज़ी है,तभी तो हमारे घर का भोजन मेहमानोंने ग्रहण किया है..!! अतः विवाह वांच्छूक युवक की झूठी थाली में, उस कन्या को उसकी माता ने भोजन परोसा । मारे शर्म के कन्या ने, अपने होनेवाले पति का झूठा  भोजन ग्रहण किया..!! हिंदु शास्त्र की मान्यता के अनुसार, जो कन्या ऐसे समय किसी युवक का झूठा खा लेती हैं तो, वह दोनों विवाह के लिए राज़ी है ऐसा माना जाता है ।
 
हालाँकि,बाद में पता चला कि, कन्या का वर्ण  श्याम होने के कारण, युवक इस कन्या से विवाह करने को राज़ी न था, पर परिवार के मुखिया के दबाव में आकर, उस युवक को अंत में, उसी कन्या से शादी करनी पड़ी..!!
 
"न हि विवाहान्तरं वरवधूपरीक्षा ।"  
 
अर्थातः- विवाह संपन्न होने के बाद  वर-वधु की जाति पूछना निरर्थक है ।   
 
पत्नी कैसी होनी चाहिए? सर्वगुण संपन्न पत्नी की व्याख्या यह है कि,
 
कार्येषु मंत्री, करणेषु दासी, भोज्येषु माता, शयनेषु रम्भा   ।
धर्मानुकूला क्षमया धरित्री । भार्या च षाड्गुण्यवतीह दुर्लभा ॥

 
कार्य प्रसंग में मंत्री, गृह कार्य में दासी, भोजन कराते वक्त माता, रति प्रसंग में रंभा, धर्म में सानुकुल, और क्षमा करने में धरित्री; इन छे गुणों से युक्त पत्नी मिलना दुर्लभ है ।
 
तमिल भाषा में, पत्नी को, “Manaivee”, अर्थात `घर का प्रमुख प्रबंधक` कहा गया है ।
 
आज भी ऐसी मान्यता है कि,"शादी-ब्याह, ईश्वर के यहाँ, पहले से तय हो जाते हैं । हम तो सिर्फ निमित्तमात्र है ।"
 


आलेख के प्रारंभ में, भले ही मैंने ये लिखा है कि, नारी को समझने का प्रयत्न,पुरूष को नहीं करना चाहिए..!! पर सच्चाई ये है कि,अगर विवाह वांच्छुक युवक-युवती, उनकी पहली मुलाकात के वक़्त ही पर्याप्त सावधानी बरतें, तो विवाहित जीवन सुखद होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है ।
 
सन-१९७० के बाद, जाति के बंधन टूटने का चलन बढ़ने की वजह से, आजकल ऐसा समय आ गया है कि, युवक-युवती शादी का फैसला खुद करते हैं जिसमें बाकी परिवारवालों को, अपने मन या बेमनसे, सिर्फ सहमति जताना बाकी होता है । इसके कई कारण है,जैसे कि, आज़ाद पीढ़ी के, आज़ाद नये विचार, सेटेलाईट क्रांति के चलते, पश्चिमी विचारधारा का बढ़ता प्रभाव, परिवार में बड़े-बुजुर्ग का घटता मान और घर से दूर, देश-परदेशमें नौकरी-धंधे के कारण, अपने समाज से अलग होने के संयोग, संतान के पुख्त होने के बाद,उनके स्वतंत्र निर्णय अधिकार के समर्थन में बने कड़े कानून,वगैरह,वगैरह..!! वैसे यह बात अलग है कि, मुग्धावस्था में शारीरिक आकर्षण के कारण, विवाह करने के, त्वरित लिए गए फैसले, कई बार ग़लत साबित होते हैं और पति-पत्नी दोनों,`न घर के न घाट के` हो जाते हैं..!!
 
हमारे देश में मनोरंजन के नाम पर, प्रसारित हो रही करीब-करीब सारी सिरियल्स में, परिवार की किसी एक बहु को `वॅम्प-अनिष्ट`के रूप में पेश करके, कथा को रोचक बनाने के मसाले कूटे जाते हैं, यह देखकर मैं सोचता हूँ, ये सारे चेनल्सवाले,किसी भी नारी को इतना ख़राब क्यों दर्शाते हैं? मगर कहानियाँ भी तो वास्तविक जीवन से ही लिखी जाती है, क्या पुरूष-क्या नारी? समाज में ऐसे अनिष्ट मौजूद है, इतना ही नहीं, ये बड़े दुर्भाग्य की बात है कि, उनकी देखा देखी, दूसरे अच्छे लोग भी, अपनी मनमानी करने के लिए, ऐसे बुरे शॉर्ट कट अपनाने लगे हैं ।
 
कर्कशा पत्नी का क्या करें?
 
हमारे देश की संस्कृति में जहाँ,`नारी को नारायणी (देवी)` का रूप माना गया हैं, उससे बिलकुल विपरीत, ऐसी कहावत भी प्रचलित है कि, "नारी अगर वश में रहे तो अपने आप से, और अगर बिगड़े तो जाएं सगे बाप से..!!" 

अर्थात नारी को प्यार से रखें तो किसी एक पुरूष के अधिपत्य में आजीवन रहती है, पर एक हद से ज्यादा, उसे प्रताडित किया जाए, तो वह अपने सगे बाप का अधिपत्य भी स्वीकारने से इनकार कर सकती है..!!"
 
हालाँकि,कर्कशा पत्नीओं की कलयुगी कहानी कोई नयी बात नहीं है, राम राज्य में भी कैकेयी-मंथरा की जुगलबंदीने, राजा दशरथ को सचमुच खटीया (मृत्युशैया) पकड़ने पर मजबूर करके, राजा  की खटीया खड़ी कर दी थी । इसी प्रकार महाभारत का भीषण युद्ध भी इर्षालु कर्कशा पत्नीओं के कारण ही हुआ था..!!

 
महान आयरिश नाट्य कार, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ( George Bernard Shaw 26 July 1856 – 2 November 1950) कहते हैं कि," जिसकी पत्नी कर्कशा-झगड़ालू होती है, उसका पति बहुत अच्छा कवि-चिंतक-विवेचक-नाट्य कार बन सकता है..!! (इस श्रेणी में, मुझे मत गिनना, मैं अपवाद हूँ..!!)
 
एकबार, एक कंपनी की ऑफ़िस में, काम से सिलसिले से मैं गया । वहाँ दोपहर की चाय-पानी का विराम काल था और कंपनी  के आला अधिकारी के साथ पूरा स्टाफ मौजूद था, ऐसे में किसी बात पर स्टाफ के एक मेम्बर ने कबूल कर लिया कि, घर में उसकी पत्नी का राज है और वह अपनी पत्नी का चरण दास है..!! फिर तो क्या था..!! जैसे अपने मन में भरे पड़े, दबाव से सब लोग छुटकारा चाहते हो, धीरे-धीरे सब स्टाफ मेम्बर्स ने कबूल किया कि, वे सब पत्नी के चरण दास है और पत्नी के आगे उनकी एक नहीं चलती..!! बाद में, सारे स्टाफ मेम्बर्स चेहरे पर मैंने,`शेठ ब्रधर्स का हाजसोल चूरन` लेने के बाद हल्के होने के भाव को उभरते देखा..!!
 
कर्कशा पत्नी को सुधारने का सही उपाय शायद यही है कि, आप पूर्ण निष्ठा भाव से, उनके चरण दास बन जाइए, बाकी सबकुछ अपने आप ठीक हो जाएगा? अगर कुछ  ठीक नहीं भी हो पाया तो, कम से कम, घर का माहौल ज्यादा बिगाड़ने से तो बच ही जाएगा..!! वर्ना..किसी रोज़ घरेलू हिंसा के, तरकटी मुक़द्दमों में फँस कर, पुलिसस्टेशन - कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने शुरू हो सकते हैं?
 
प्यारे दोस्तों,सत्य तो यही है कि,
 
१. तमाम जगह और घर-परिवार में आप पत्नी का आदर करें ।
 
२. पत्नी को ग़ुलाम या बगैर वेतन की काम वाली बाई जैसा मत समझें ।
 
३. पत्नी के प्रति आपके प्यार को, मन में ही दबाकर मत रखें, समय-समय पर उसके साथ वक़्त बीता कर, उससे प्यार का इज़हार करें ।
 
४. कम से कम अपने घर में, ऑफ़िस का रूआब मत झाड़िए,याद रखें, घर में आपकी पत्नी ही आपकी बॉस होती है..!!
 
५. सिर्फ पैसा कमाने के उद्यम में मत उलझे रहें, साल में एक-दो बार पत्नी को, दूसरे-तीसरे-चौथे प्रमोदकाल (Honey-Moon) पर ले जाएं ।
 
अगर, उपर दर्शाये सारे उपाय भी घर का माहौल सुधारने के लिए कारगर साबित न हो,तो फिर,`आशा अमर है । सूत्र को आत्मसात करके, कर्कशा पत्नी आज नहीं तो कल सुधर जाएगी, ऐसी उम्मीद पर सारा जीवन बीताएं..!!

एक आखिरी नसिहत,आदरणीय श्री संजीव कुमार, विद्यासिन्हा की फिल्म,"पति-पत्नी और वोह" वाली `वोह` के चक्कर में कभी मत पड़ना, वर्ना आप को भी, रात-दिन ठंडे-ठंडे पानी से नहाने के दिन गुज़ारने का समय आ सकता है..!!
 
वैसे, आज आप भी, अपने सिर पर हाथ रखकर, कसम दोहरायें कि,

"मैं जो कहूँगा सच कहूँगा और सच के अलावा कुछ न कहूँगा..!!"


" क्या आप भी चरण दास हैं?"

"अरे..!! हँसना मना है, भाई..!!"

मार्कण्ड दवे । दिनांक- २०-०४-२०११.

बुधवार, 30 मई 2012

प्रिये तुम्हारी मधुर वाणी में कोई गीत सुना दो



प्रिये तुम्हारी
मधुर वाणी में कोई
गीत सुना दो
मेरे अंतर्मन को
उल्लास से भर दो
खुशी के अंकुर को
प्रस्फुटित कर दो
निराशा के भावों को
आशा कि वर्षा से
धो दो
रोम रोम में विश्वास के
महकते पुष्पों को
पल्लवित कर दो
ह्रदय में प्रेम सरिता
प्रवाहित कर दो
जीवन को
उत्साह के रंगों से
भर दो
मुझे संताप से मुक्त
कर दो
प्रिये तुम्हारी
मधुर वाणी में कोई
गीत सुना दो

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर""  
30-05-2012
550-70-05-12

लालची लड़कियां

         
कुछ लड़कियां
रंगबिरंगी तितलियों सी मदमाती है
भीनी भीनी खुशबू  से ललचाती है
उड़ उड़ कर पुष्पों पर मंडराती  है
बार बार पुष्पों का रस पीती है
रस की लोभी है,मस्ती से जीती है
कुछ लड़कियां,
कल कल करती नदिया सी,
खारे से समंदर से भी,
मिलने को दौड़ी चली जाती है
क्योंकि समंदर,
तो है रत्नाकर,
उसके मंथन से,रतन जो पाती है
कुछ लड़कियां,
पानी की बूंदों सी,
काले काले बादल का संग छोड़,
इठलाती,नाचती है हवा में
धरती से मिलने का सुख पाने
और धरती की बाहों  में जाती है समा
क्योंकि धरा,होती है रत्नगर्भा  
ये लड़कियां,
खुशबू और रत्नों के सपने ही संजोती है
इतनी लालची क्यों होती है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

मंगलवार, 29 मई 2012

श्रेष्ठ होने का अहम्



मुझे अकेला देख
आज सूनी पगडंडी भी
मुझ पर हँस रही थी
किनारे लगे पेड़
आश्चर्य से देख रहे थे
पेड़ पर बैठी कोयल भी
क्रोध में
जोर से कूंकने लगी
मानो सब मुझे अहसास
कराना चाहते थे
तुम्हारे बिना मेरा कोई
अस्तित्व नहीं है
भावना हीन
हाड़ मांस के पुतले से
अधिक नहीं हूँ
मात्र पुरुष होने के कारण
तुमसे श्रेष्ठ होने का अहम्
चूर चूर हो गया
मुझे सत्य का पता चल गया
पती पत्नी में ना कोई
श्रेष्ठ होता
ना ही निकृष्ट होता
एक में कमी की पूर्ती
दूसरा करता
अब लौट कर आ जाओ
मुझे प्रायश्चित करने में
सहयोग दो
तुम्हारे बिना वह भी
ठीक से नहीं कर पाऊंगा


(डा.राजेंद्र तेला"निरंतर")
29-05-2012
542-62-05-12

चलो आज कुछ तूफानी करते है

चलो  आज कुछ तूफानी करते है
होटल में पैसे उड़ाते नहीं,
गरीबों का चायपानी करते है
चलो ,आज कुछ तूफानी करते है
अनपढ़ को पढना सिखायेंगे  है हम
भूखों को खाना खिलाएंगे  हम
काला ,पीला ठंडा पियेंगे नहीं,
प्यासों को पानी पिलायेंगे हम
काम किसी के तो आ जाएगी,
दान चीजें पुरानी करतें है
चलो,आज कुछ तूफानी करते है
निर्धन की बेटी की शादी कराये
अंधों की आँखों पे चश्मा चढ़ाएं
अपंगों को चलने के लायक बनाये
पैसे नहीं,पुण्य ,थोडा  कमाए
अँधेरी कुटिया में दीपक जला,
उनकी दुनिया सुहानी करते है
चलो ,आज कुछ तूफानी करते है
बूढों,बुजुर्गों को सन्मान दें
बुढ़ापे में उनका सहारा  बनें
बच्चों का बचपन नहीं छिन सके
हर घर में आशा की ज्योति   जगे
लाचार ,बीमार ,इंसानों के,
जीवन में हम रंग भरते है
चलो,आज कुछ तूफानी करते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शनिवार, 26 मई 2012

मीना कुमारी ।


महज-बीन = महजबीन बानो उर्फ़ मीना कुमारी ।
(courtesy-Google images)

नाम -  महज-बीन = महजबीन  बानो उर्फ़ मीना कुमारी ।

जन्म - १ -अगस्त -१९३२.

दुखद निधन -३१ -मार्च -१९७२.

पिता का नाम - अली बक्षजी ।

(संगीत टीचर -हार्मोनियम प्लेयर-पारसी थियेटर-उर्दू शायर -संगीतकार फिल्म-`शाही लूटेरे`। )

माता का नाम - प्रभादेवी उर्फ़ इक़बाल बेग़म ।

( प्रभावतीदेवी, शादी से पहले `कामिनी` के नाम से स्टेज एक्ट्रेस -नर्तकी थीं । शादी के बाद मुस्लिम धर्म अंगिकार करके `इक़बाल बेग़म`` नाम रख लिया । कहते हैं की, उनकी माता `हेमसुंदरी` का विवाह `टैगोर परिवार ` में हुआ था । )

दो छोटी बहनें - नाम - ख़ूरशिद और मधु ।

जिंदगी के कुछ दुखद पल -

१. `ट्रैजेडी क्वीन ` मीनाकुमारीजी  का जन्म होने के तुरंत बाद, उनके पिता के पास अस्पताल का  बिल  भरने के लिए पैसे न होने की वजह से , कुछ घंटे के लिए, मीनाकुमारीजी को यतीमख़ाने में गुज़ारने पड़े थे । कुछ समय पश्चात ,अस्पताल के बिल  की रकम अदा करके, उनके पिता उन्हें यतीमख़ाने से वापस घर ले गये थे ।

२. सुश्री मीनाकुमारीजी अपने पिताजी से ,`मुझे पाठशाला जाना है, पढ़ाई करनी है ।` की रट़ लगाती रहीं और ग़रीबी के कारण उनके पिताजी ने उन्हें सिर्फ सात साल की कच्ची उम्र में ही, ` बेबी मीना ` के नाम से, रुप-तारा स्टूडियो में, जिंदगी की  पहली फिल्म,`फ़रज़ाद-ए - वतन - १९३९.` में कैमरा के सामने लाकर खड़ा कर दिया ।

उस के बाद, अपनी उम्र से पहले ही जवान हो कर, मीना कुमारी के नाम से, धार्मिक  फिल्म, `गटोर्गच्छ -१९४९` और तिलस्मी फिल्म -`अलादिन और जादुई चिराग़ -१९५२` जैसी फिल्मों में, वेतन पाकर आपने  घर का निर्वहन करती रहीं ।

जिंदगी के कुछ हसीँन पल -

१. निर्माता - श्री विजय भट्ट साहब की, सन-१९५२ में निर्मित फिल्म,` बैजु बावरा ` ने, मीनाकुमारीजी को, सफल अभिनेत्री के रुप में स्थापित किया, उपरान्त  एक मात्र उनको `बेस्ट एक्ट्रेस ` का फिल्म फेर अवार्ड भी प्राप्त हुआ ।

२. अब मीनाकुमारीजी के नाम के ड़ंके बजने लगे । एक के बाद एक, सफल फ़िल्मो की जैसे लाइन लग गई । `परिणिता -१९५३.`; `एक ही रास्ता -१९५६.`; `शारदा - १९५७.`; दिल अपना और प्रित पराई -१९६०.`; कोहिनूर -१९६०.` इत्यादि...।

३. इसी दौरान, मीनाकुमारीजी ने उम्र में, अपने से  पंद्रह साल बड़े, श्री कमाल अमरोहीजी से, सन-१९५२ में प्रेम लग्न कर लिए । (तलाक़ - १९६०)

सन-  १९६२ में समर्थ  निर्माता-निर्देशक-अभिनेता श्री गुरुदत्तजी के साथ,`साहिब बीबी और ग़ुलाम` और उसके बाद फिल्म `छोटी बहु` में हताशा के कारण, शराब में डूबी हुई,  पत्नी का  अविस्मरणीय अभिनय किया । 

दोस्तों, और विधाता के लेख देखें, बाद में मीनाकुमारीजी वास्तविक ज़िंदगी में भी, अकेलेपन से इस क़दर हताश हुई की , वह सचमुच  शराब की लत की शिकार हो गई ।

शायद, वास्तविक ज़िंदगी के बेपनाह दर्द को अभिनय में ढाल कर मीनाकुमारीजी ने, फिल्म `छोटी बहु` में, `पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे` गाने में, ऐसा ला-जवाब अभिनय  किया है की, आज भी यह गाने के साथ ही, उनके चाहने वालों की आँखें नम हो जाती है ।

करीब ९० से ज्यादा फिल्में, जिनमें ज्यादातर फिल्मों ने सफलता के शिखर को छुआ था, करीब ३० साल के फिल्मी करियर के दौरान ज़ालिम ज़माने से और ज्यादातर अपने पति की ओर से बेक़द्री, धोखा, बेवफ़ाई और सन-१९६० में,  हुए तलाक़ की पीड़ा से आहत होकर, इस चकाचौंध से भरी नकली दुनिया से मीनाकुमारीजी का दिल उठ गया ।

शराब की आदत ने उन्हें आर्थिक रुप से भी तोड़ दिया । मानो उनके शरीर ने भी उनका साथ न देने का मन बना लिया था,अंततः उनकी  सेहत  ख़राब रहने लगी।

फिर भी,  भूत-पूर्व पति कमाल अमरोही का, अभी भी जैसे कोई ऋण अदा करना बाक़ी रह गया हो, मीनाकुमारीजी ने, आज भी फ्रेश और क्लासिक फिल्मोमें गिनी जानेवाली, श्रीकमाल अमरोहीजी की कमाल फिल्म ` पाक़ीज़ा ` में  आख़री बार अपनी जान डालकर फिर से ला-जवाब अभिनय किया ।

पर हाय रे किस्मत..!! ट्रैजेडी क्वीन मीनाकुमारीजी की तक़दीर ने फिर से, मानो उनके जन्म के समय का हादसा दोहराना  तय किया हो, `पाक़ीज़ा ` के रिलीज होने के दो माह पश्चात, उनकी आख़री फिल्म `पाक़ीज़ा` ` पर, मीनाकुमारीजी के चाहनेवालों की भीड़ के साथ, आय के नये विक्रम स्थापित कर रही थी और यहाँ  अकेलेपन के दर्द से दुःखी,मीनाकुमारीजी के पास अपने इलाज के लिए,अस्पताल का बिल भरने के लिए पैसे न थे ।

शायद इसी लिए, सुश्री मीनाकुमारीजी ने अपनी आख़री साँस भरते वक़्त कहा की,

" तलाक़ तो दे रहे हो, नज़रें कहर के साथ, जवानी भी मेरी लौटा दो महेर के साथ ।"

प्यारे दोस्तों, अगर यह लेख के द्वारा ट्रैजेडी क्वीन मीनाकुमारीजी के लिए, किसी के मन में अनु-कंपा या दर्द की सूनामी न उभर आयी हो तो, मैं उनके दर्द भरे दिल, लेकिन मधुर कंठ से गाये हुए कुछ प्रसिद्ध अशआर पेश करने की इजाज़त चाहता हूँ , जिसे सुनकर, क्या पता आपकी आँख का एक कोना, शायद ट्रेजेडी क्वीन की याद में, आँसू  से भींग जाए..!!

डाउनलोड लिंक्स-








अंत में, हम सब मालिक से यही दुवा कर सकते हैं, मीनाकुमारीजी आप जहाँ भी रहें, बस अब बड़े सुकून से रहें ।

" सुश्री मीनाकुमारीजी, अगर आप हमें सुन रहीं हैं तो हम आपसे  कहना चाहते हैं की, पुरी दुनिया के कोने-कोने में बसने वाले आपके सभी चाहनेवालें आज भी आप को सच्चे दिल से उतना ही प्यार करते हैं ।"

मार्कण्ड दवे । दिनांक - ११ -०३ -२०११.

शुक्रवार, 25 मई 2012

परिकल्पना सम्मान हेतु चयनित ब्लॉगरों की सूची


बात उन दिनों की है जब फेसबूक, ट्यूटर जैसे सोशल नेटवर्किंग के आकर्षण मे आवद्ध होकर ब्लॉगरों की ब्लॉग पर सहभागिता कुछ कम होने लगी थी । ब्लॉग जैसे लोकतान्त्रिक माध्यम से हिन्दी को नया आयाम देने और पारस्परिक प्रेम के आदान-प्रदान हेतु मेरे द्वारा कुछ मित्रों को साथ लेकर ब्लॉग पर उत्सव कीपरिकल्पना की गयी, क्योंकि उत्सव का अभिप्राय ही है पारस्परिक प्रेम का आदान-प्रदान। 

परिकल्पना पर १५ अप्रैल २०१० से शुरू हुये उस उत्सव की पंचलाइन थी -अनेक ब्लॉग नेक हृदय...। यह उत्सव दो माह तक निर्वाध गति से परिकल्पना पर जारी रहा। इसका समापन हमने विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देनेवाले 51 चिट्ठाकारों के सारस्वत सम्मान से किया। उत्सव के दौरान सारगर्भित टिपण्णी देने वाले श्रेष्ठ टिप्पणीकार को भी इस अवसर पर सम्मानित किया गया

उस उत्सव का मुख्य आकर्षण था दुष्यंत के बाद सर्वाधिक चर्चित गज़लकार श्री अदम गोंडवी की रचनात्मक उपस्थिती । उ० प्र० प्रगतिशील लेखक संघ की राज्य इकाई के सदस्य श्री शकील सिद्दीकी ने उस अवसर पर बताया कि कैसे हिंदी ब्लोगिंग ने एक उत्तेजक वातावरण का निर्माण किया है ? ,श्री समीर लाल समीर ने बताया उड़न तश्तरी की कामयाबी का राजहिंदी चिट्ठाकारिता में अपने अनुभवों से रूबरू कराया श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय ने, हिंदी ब्लोगिंग के कई अनछुए पहलूओं को उजागर किया श्री रवि रतलामी ने, हिंदी ब्लोगिंग की समृद्धि को आयामित करने के उपायों पर चर्चा की श्री शास्त्री जे० सी० फिलिप , अविनाश वाचस्पतिजी०के०अवधिया, गिरीश पंकज आदि, हिंदी चिट्ठाकारी की विकास यात्रा पर प्रकाश डाला श्री अरविन्द श्रीवास्तव ने  ....आदि-आदि

वाणी वन्दना और गणपति वन्दना को स्वर देकर उत्सव का श्री गणेश किया सुश्री स्वप्न मंजूषा 'अदा' और सुश्री पारुल ने। वाणी वन्दना और उत्सव गीत लिखे आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने । इस अवसर पर श्री मती निर्मला कपिला की प्यारी ग़ज़ल को स्वर दिया श्री सुनील सिंह डोगरा ने। प्रेम के प्रतीक श्री इमरोज से प्रेम परक बातचीत प्रस्तुत की श्री माती रश्मि प्रभा ने, अपनी कविताओं को स्वयं आवाज़  दिये श्री पंकज सुबीर , रश्मि प्रभा , अनुराग शर्मा, स्वप्न मंजूषा'अदा' आदि रचनाकार । रंजना (रंजू) भाटिया ने सुनाया उत्तराखंड की यात्रा का वृत्तांत। इसके अलावा ढेरों कविताएँ, गीत,ग़ज़ल, कहानियां , संस्मरण आदि पढ़ने और सुनने को मिले

वर्ष-2011 मे भी परिकल्पना पर ब्लॉग उत्सव मनाया गया और इसमें शामिल हुये 500 से ज्यादा ब्लॉगर, किन्तु जब सारस्वत सम्मान देने की बारी आई तो ऐसे लोगों का विरोध दिखा जो इस ब्लोगोत्सव का कभी हिस्सा ही न रहे । फिर भी मैंने सबकी सलाह सुनी और सबकी टिप्पणी पर गौर किया । 

दशक के ब्लॉग और ब्लॉगर हेतु कराये गए मतदान पर भारी संख्या मे मत प्राप्त हो रहे है । समय-समय पर रुझान बताने से ब्लॉगरों मे भ्रम की स्थिति बनती है । इसलिए दशक के ब्लॉग और ब्लॉगर के चयन की अंतिम सूची  हम जून-2012 के प्रथम सप्ताह मे जारी करेंगे और उनका सारस्वत सम्मान हम अगस्त माह के प्रथम सप्ताह मे परिकल्पना सम्मान समारोह मे करेंगे ।

विषय आधारित 41 ब्लॉगरों के चयन मे तमाम ब्लॉगरों की सलाह पर गौर किया जा रहा है और उन सलाहों के आधार पर एक सूची तैयार कराते हुये  निर्णायक मण्डल को भेजा जा रहा है, निर्णायकों के प्राप्त मन्तव्य के आधार पर सहमति बनाते हुये हम शीघ्र चयनित सूची आप सभी के सामने लाएँगे । 


संतोषत्रिवेदी जी और मनोज पाण्डेय जी ने इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा करते हुये कुछ महत्वपूर्ण सलाह दिये हैं, जिसे पूरी गंभीरता के साथ अमल मे लाया जा रहा है । तबतक धैर्य बनाए रखें ।  


एक तिहाई तलाक़ों के पीछे फेसबूक


फेसबूक के सी ई ओ मार्क जुकरवर्ग ने हाल ही मे फेसबूक पर यह भले ही घोषणा की है कि वे विवाहित हैं, ब्रिटेन के एक सर्वे के अनुसार दुनिया भर के तलाक़ों के पीछे फेसबूक का हाथ है ।

सर्वे के अनुसार तलाक का आवेदन करने वाले दंपति अपने साथी की फेसबूक पर उनके व्यवहार की शिकायत कर रहे हैं । इनमें सबसे ज्यादा अनुचित संदेशों को भेजने की शिकायतें है । संस्था ने पिछले साल के पाँच हजार तलाक के आवेदनों का अध्ययन किया और पाया कि 33 प्रतिशत से अधिक तलाक आवेदन फेसबूक के कारण ही हुये हैं । वर्ष 2009 मे यह प्रतिशत 20 था ।

डेली मेल के से डाइवर्स ऑनलाइन के प्रवक्ता मार्क कैनन ने कहा कि यदि किसी को फ़्लर्ट करना है तो फेसबूक सबसे ज्यादा आसान माध्यम है । अमेरिकन एकेडमी ऑफ मेट्रोमोनियल लायर्स का कहना है कि 80 प्रतिशत वकीलों का भी मानना है कि शोषल नेटवर्किंग के कारण तलाक के आवेदन बढ़े हैं ।

"फेसबूक एंड योर मैरिज" पुस्तक लिखने वाले के। जयसान क्राफसकी का कहना है कि पहले सालों या कई महीनों मे पनपने वाले अफेयर अब सिर्फ कुछ किलिक से संभाव हो गए हैं । अध्ययन मे यह भी पाया गया कि तलाकशुदा लोग भी अपने पूर्व साथी के बारे मे टिप्पणियाँ कर रहे हैं । 

संयम- दो कविताये

   
                   1
               चिक
मेरे शयनकक्ष में,रोज धूप आती थी सर्दी  में सुहाती थी
गर्मी में सताती थी
अब मैंने एक चिक लगवाली है और धूप से मनचाही निज़ात पा ली है
समय के अनुरूप
वासना की धूप
जब मेरे संयम की चिक की दीवार से टकराती है
कभी हार जाती है
कभी जीत  जाती है
                      २
         तकिया
जिसको सिरहाने रख कर के,
                           मीठी नींद कभी आती थी
जिसको बाहों में भर कर के
                         ,रात विरह की कट जाती थी
कोमल तन गुदगुदा रेशमी,
                        बाहुपाश में सुख देता था
जैसे चाहो,वैसे खेलो,
                         मौन सभी कुछ सह लेता था
वो तकिया भी ,साथ उमर के,
                        जो गुल था,अब खार  बन गया
बीच हमारे और तुम्हारे,
                           संयम की दीवार   बन गया

मदन मोहन बाहेती'घोटू'   

बुधवार, 23 मई 2012

गाँव का वो घर-वो गर्मी की छुट्टी


          
मुझे याद आता है,गाँव का वो घर,
                        वो गर्मी की रातें, वो बचपन सलोना
ठंडी सी  छत पर,बिछा  कर के बिस्तर,
                       खुली चांदनी में,पसर कर के सोना
ढले दिन और नीड़ों में लौटे परिंदे,
                        एक एक कर उन सारों को गिनना
पड़े  रात तारे ,लगे जब निकलने,
                        तो नज़रे घुमा के,  उन सारों को गिनना
भीगा   बाल्टी में, भरे आम ठन्डे,
                         ले ले के चस्के,  उन्हें चूसना    फिर
एक दूसरे को पहाड़े सुनाना,
                          पहेली  बताना,  उन्हें  बूझना   फिर
जामुन के पेड़ो पे चढ़ कर के जामुन,
                           पकी ढूंढना  और  खाना  मज़े से
करोंदे की झाड़ी से ,चुनना करोंदे,
                           पकी खिरनी चुन चुन के लाना  मज़े से
अम्बुआ की डाली पे,कोयल की कूहू,
                           की करना नक़ल और चिल्ला के गाना
,कच्ची सी अमियायें ,पेड़ों पर चढ़ कर,
                           चटकारे ले ले के,मस्ती में    खाना
चूल्हे में लकड़ी  और कंडे जला कर,
                             गरम रोटियां जब खिलाती थी अम्मा
कभी लड्डू मठरी,कभी सेव पपड़ी,
                              कभी ठंडा शरबत   पिलाती थी अम्मा
 कभी चोकड़ी ताश की मिल ज़माना,
                             कभी सूनी सड़कों पे लट्टू  घुमाना
भुलाये  भी मुझको नहीं भूलती  है,
                              वो गर्मी की छुट्टी, वो  बचपन सुहाना

मदन मोहन बाहेती'घोटू'         

  


हिंदी ग़ज़ल की विकास यात्रा पर रवीन्द्र प्रभात का एक समग्र आलेख

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