" तलाक़ तो दे रहे हो, नज़रें कहर के साथ, जवानी भी मेरी लौटा दो महेर के साथ ।"
लेखकों से अनुरोध
परिकल्पना पर लिखने वाले लेखकों से अनुरोध है कि जो भी पोस्ट यहाँ पर लिखें,विस्तृत हो,सारगर्भित हो। अपने ब्लॉग पर प्रकाशित पोस्ट का लिंक यहाँ ना लगाएँ,ऐसा करने पर मजबूरन उन्हें हटाना पड़ेगा।
शनिवार, 26 मई 2012
मीना कुमारी ।
महज-बीन = महजबीन बानो उर्फ़ मीना कुमारी ।
(courtesy-Google images)
जन्म - १ -अगस्त -१९३२.
दुखद निधन -३१ -मार्च -१९७२.
पिता का नाम - अली बक्षजी ।
(संगीत टीचर -हार्मोनियम प्लेयर-पारसी थियेटर-उर्दू शायर -संगीतकार फिल्म-`शाही लूटेरे`। )
माता का नाम - प्रभादेवी उर्फ़ इक़बाल बेग़म ।
( प्रभावतीदेवी, शादी से पहले `कामिनी` के नाम से स्टेज एक्ट्रेस -नर्तकी थीं । शादी के बाद मुस्लिम धर्म अंगिकार करके `इक़बाल बेग़म`` नाम रख लिया । कहते हैं की, उनकी माता `हेमसुंदरी` का विवाह `टैगोर परिवार ` में हुआ था । )
दो छोटी बहनें - नाम - ख़ूरशिद और मधु ।
जिंदगी के कुछ दुखद पल -
१. `ट्रैजेडी क्वीन ` मीनाकुमारीजी का जन्म होने के तुरंत बाद, उनके पिता के पास अस्पताल का बिल भरने के लिए पैसे न होने की वजह से , कुछ घंटे के लिए, मीनाकुमारीजी को यतीमख़ाने में गुज़ारने पड़े थे । कुछ समय पश्चात ,अस्पताल के बिल की रकम अदा करके, उनके पिता उन्हें यतीमख़ाने से वापस घर ले गये थे ।
२. सुश्री मीनाकुमारीजी अपने पिताजी से ,`मुझे पाठशाला जाना है, पढ़ाई करनी है ।` की रट़ लगाती रहीं और ग़रीबी के कारण उनके पिताजी ने उन्हें सिर्फ सात साल की कच्ची उम्र में ही, ` बेबी मीना ` के नाम से, रुप-तारा स्टूडियो में, जिंदगी की पहली फिल्म,`फ़रज़ाद-ए - वतन - १९३९.` में कैमरा के सामने लाकर खड़ा कर दिया ।
उस के बाद, अपनी उम्र से पहले ही जवान हो कर, मीना कुमारी के नाम से, धार्मिक फिल्म, `गटोर्गच्छ -१९४९` और तिलस्मी फिल्म -`अलादिन और जादुई चिराग़ -१९५२` जैसी फिल्मों में, वेतन पाकर आपने घर का निर्वहन करती रहीं ।
जिंदगी के कुछ हसीँन पल -
१. निर्माता - श्री विजय भट्ट साहब की, सन-१९५२ में निर्मित फिल्म,` बैजु बावरा ` ने, मीनाकुमारीजी को, सफल अभिनेत्री के रुप में स्थापित किया, उपरान्त एक मात्र उनको `बेस्ट एक्ट्रेस ` का फिल्म फेर अवार्ड भी प्राप्त हुआ ।
२. अब मीनाकुमारीजी के नाम के ड़ंके बजने लगे । एक के बाद एक, सफल फ़िल्मो की जैसे लाइन लग गई । `परिणिता -१९५३.`; `एक ही रास्ता -१९५६.`; `शारदा - १९५७.`; दिल अपना और प्रित पराई -१९६०.`; कोहिनूर -१९६०.` इत्यादि...।
३. इसी दौरान, मीनाकुमारीजी ने उम्र में, अपने से पंद्रह साल बड़े, श्री कमाल अमरोहीजी से, सन-१९५२ में प्रेम लग्न कर लिए । (तलाक़ - १९६०)
सन- १९६२ में समर्थ निर्माता-निर्देशक-अभिनेता श्री गुरुदत्तजी के साथ,`साहिब बीबी और ग़ुलाम` और उसके बाद फिल्म `छोटी बहु` में हताशा के कारण, शराब में डूबी हुई, पत्नी का अविस्मरणीय अभिनय किया ।
दोस्तों, और विधाता के लेख देखें, बाद में मीनाकुमारीजी वास्तविक ज़िंदगी में भी, अकेलेपन से इस क़दर हताश हुई की , वह सचमुच शराब की लत की शिकार हो गई ।
शायद, वास्तविक ज़िंदगी के बेपनाह दर्द को अभिनय में ढाल कर मीनाकुमारीजी ने, फिल्म `छोटी बहु` में, `पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे` गाने में, ऐसा ला-जवाब अभिनय किया है की, आज भी यह गाने के साथ ही, उनके चाहने वालों की आँखें नम हो जाती है ।
करीब ९० से ज्यादा फिल्में, जिनमें ज्यादातर फिल्मों ने सफलता के शिखर को छुआ था, करीब ३० साल के फिल्मी करियर के दौरान ज़ालिम ज़माने से और ज्यादातर अपने पति की ओर से बेक़द्री, धोखा, बेवफ़ाई और सन-१९६० में, हुए तलाक़ की पीड़ा से आहत होकर, इस चकाचौंध से भरी नकली दुनिया से मीनाकुमारीजी का दिल उठ गया ।
शराब की आदत ने उन्हें आर्थिक रुप से भी तोड़ दिया । मानो उनके शरीर ने भी उनका साथ न देने का मन बना लिया था,अंततः उनकी सेहत ख़राब रहने लगी।
फिर भी, भूत-पूर्व पति कमाल अमरोही का, अभी भी जैसे कोई ऋण अदा करना बाक़ी रह गया हो, मीनाकुमारीजी ने, आज भी फ्रेश और क्लासिक फिल्मोमें गिनी जानेवाली, श्रीकमाल अमरोहीजी की कमाल फिल्म ` पाक़ीज़ा ` में आख़री बार अपनी जान डालकर फिर से ला-जवाब अभिनय किया ।
पर हाय रे किस्मत..!! ट्रैजेडी क्वीन मीनाकुमारीजी की तक़दीर ने फिर से, मानो उनके जन्म के समय का हादसा दोहराना तय किया हो, `पाक़ीज़ा ` के रिलीज होने के दो माह पश्चात, उनकी आख़री फिल्म `पाक़ीज़ा` ` पर, मीनाकुमारीजी के चाहनेवालों की भीड़ के साथ, आय के नये विक्रम स्थापित कर रही थी और यहाँ अकेलेपन के दर्द से दुःखी,मीनाकुमारीजी के पास अपने इलाज के लिए,अस्पताल का बिल भरने के लिए पैसे न थे ।
शायद इसी लिए, सुश्री मीनाकुमारीजी ने अपनी आख़री साँस भरते वक़्त कहा की,
" तलाक़ तो दे रहे हो, नज़रें कहर के साथ, जवानी भी मेरी लौटा दो महेर के साथ ।"
प्यारे दोस्तों, अगर यह लेख के द्वारा ट्रैजेडी क्वीन मीनाकुमारीजी के लिए, किसी के मन में अनु-कंपा या दर्द की सूनामी न उभर आयी हो तो, मैं उनके दर्द भरे दिल, लेकिन मधुर कंठ से गाये हुए कुछ प्रसिद्ध अशआर पेश करने की इजाज़त चाहता हूँ , जिसे सुनकर, क्या पता आपकी आँख का एक कोना, शायद ट्रेजेडी क्वीन की याद में, आँसू से भींग जाए..!!
डाउनलोड लिंक्स-
अंत में, हम सब मालिक से यही दुवा कर सकते हैं, मीनाकुमारीजी आप जहाँ भी रहें, बस अब बड़े सुकून से रहें ।
" सुश्री मीनाकुमारीजी, अगर आप हमें सुन रहीं हैं तो हम आपसे कहना चाहते हैं की, पुरी दुनिया के कोने-कोने में बसने वाले आपके सभी चाहनेवालें आज भी आप को सच्चे दिल से उतना ही प्यार करते हैं ।"
मार्कण्ड दवे । दिनांक - ११ -०३ -२०११.
Labels:
ट्रैजेडी क्वीन,
तलाक़,
पाक़ीज़ा,
बॉक्स ऑफ़िस,
मार्कण्ड दवे,
मीना कुमारी
शुक्रवार, 25 मई 2012
परिकल्पना सम्मान हेतु चयनित ब्लॉगरों की सूची
बात उन दिनों की है जब फेसबूक, ट्यूटर
जैसे सोशल नेटवर्किंग के आकर्षण मे आवद्ध होकर ब्लॉगरों की ब्लॉग पर सहभागिता कुछ कम
होने लगी थी । ब्लॉग जैसे लोकतान्त्रिक माध्यम से हिन्दी को नया आयाम देने और पारस्परिक
प्रेम के आदान-प्रदान हेतु मेरे द्वारा कुछ मित्रों को साथ लेकर ब्लॉग पर उत्सव कीपरिकल्पना की गयी, क्योंकि उत्सव का अभिप्राय ही है पारस्परिक प्रेम का
आदान-प्रदान।
परिकल्पना पर १५ अप्रैल २०१० से शुरू हुये उस उत्सव की पंचलाइन
थी -अनेक ब्लॉग नेक हृदय...। यह उत्सव दो माह तक निर्वाध गति से
परिकल्पना पर जारी रहा। इसका समापन हमने विभिन्न क्षेत्रों
में उल्लेखनीय योगदान देनेवाले 51 चिट्ठाकारों के सारस्वत सम्मान से किया। उत्सव के दौरान
सारगर्भित टिपण्णी देने वाले श्रेष्ठ टिप्पणीकार को भी इस अवसर पर सम्मानित किया गया ।
उस उत्सव का मुख्य आकर्षण था दुष्यंत के बाद सर्वाधिक चर्चित गज़लकार श्री अदम गोंडवी की रचनात्मक उपस्थिती
। उ० प्र० प्रगतिशील लेखक संघ की राज्य इकाई के सदस्य श्री शकील सिद्दीकी
ने उस अवसर पर बताया कि कैसे हिंदी ब्लोगिंग ने एक उत्तेजक वातावरण का निर्माण
किया है ? ,श्री समीर लाल समीर ने बताया उड़न तश्तरी की कामयाबी का राज, हिंदी चिट्ठाकारिता
में अपने अनुभवों से रूबरू कराया श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय ने, हिंदी ब्लोगिंग के
कई अनछुए पहलूओं को उजागर किया श्री रवि रतलामी ने, हिंदी ब्लोगिंग की
समृद्धि को आयामित करने के उपायों पर चर्चा की श्री शास्त्री जे०
सी० फिलिप , अविनाश वाचस्पति, जी०के०अवधिया, गिरीश पंकज आदि, हिंदी चिट्ठाकारी
की विकास यात्रा पर प्रकाश डाला श्री अरविन्द श्रीवास्तव ने ....आदि-आदि।
वाणी वन्दना और गणपति वन्दना को स्वर देकर उत्सव का श्री
गणेश किया सुश्री स्वप्न मंजूषा 'अदा' और सुश्री पारुल ने। वाणी वन्दना और
उत्सव गीत लिखे आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने । इस अवसर पर श्री मती निर्मला कपिला की प्यारी ग़ज़ल को
स्वर दिया श्री सुनील सिंह डोगरा ने। प्रेम के प्रतीक श्री इमरोज से प्रेम परक बातचीत प्रस्तुत की श्री माती
रश्मि प्रभा ने, अपनी कविताओं को स्वयं आवाज़ दिये श्री पंकज सुबीर , रश्मि प्रभा , अनुराग शर्मा, स्वप्न मंजूषा'अदा' आदि रचनाकार ।
रंजना (रंजू) भाटिया ने सुनाया उत्तराखंड की यात्रा का
वृत्तांत। इसके अलावा ढेरों कविताएँ, गीत,ग़ज़ल, कहानियां , संस्मरण आदि पढ़ने और सुनने को मिले ।
वर्ष-2011 मे भी परिकल्पना पर ब्लॉग उत्सव मनाया गया और
इसमें शामिल हुये 500 से ज्यादा ब्लॉगर, किन्तु जब सारस्वत सम्मान देने की बारी
आई तो ऐसे लोगों का विरोध दिखा जो इस ब्लोगोत्सव का कभी हिस्सा ही न रहे । फिर भी मैंने
सबकी सलाह सुनी और सबकी टिप्पणी पर गौर किया ।
दशक के ब्लॉग और ब्लॉगर हेतु कराये गए मतदान पर भारी संख्या
मे मत प्राप्त हो रहे है । समय-समय पर रुझान बताने से ब्लॉगरों मे भ्रम की स्थिति बनती
है । इसलिए दशक के ब्लॉग और ब्लॉगर के चयन की अंतिम सूची हम जून-2012 के प्रथम सप्ताह मे जारी करेंगे और उनका
सारस्वत सम्मान हम अगस्त माह के प्रथम सप्ताह मे परिकल्पना सम्मान समारोह मे करेंगे
।
विषय आधारित 41 ब्लॉगरों के चयन मे तमाम ब्लॉगरों की सलाह पर गौर किया जा रहा है और उन सलाहों के आधार पर एक सूची तैयार
कराते हुये निर्णायक मण्डल को भेजा जा रहा है, निर्णायकों के प्राप्त
मन्तव्य के आधार पर सहमति बनाते हुये हम शीघ्र चयनित सूची आप सभी के सामने लाएँगे ।
संतोषत्रिवेदी जी और मनोज पाण्डेय जी ने इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा करते हुये कुछ महत्वपूर्ण सलाह दिये हैं, जिसे पूरी गंभीरता के साथ अमल मे लाया जा रहा है । तबतक धैर्य बनाए रखें ।
संतोषत्रिवेदी जी और मनोज पाण्डेय जी ने इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा करते हुये कुछ महत्वपूर्ण सलाह दिये हैं, जिसे पूरी गंभीरता के साथ अमल मे लाया जा रहा है । तबतक धैर्य बनाए रखें ।
Labels:
परिकल्पना सम्मान
एक तिहाई तलाक़ों के पीछे फेसबूक
फेसबूक के सी ई ओ मार्क जुकरवर्ग ने हाल ही मे फेसबूक पर यह
भले ही घोषणा की है कि वे विवाहित हैं, ब्रिटेन के एक सर्वे के अनुसार दुनिया भर के
तलाक़ों के पीछे फेसबूक का हाथ है ।
सर्वे के अनुसार तलाक का आवेदन करने वाले दंपति अपने साथी की
फेसबूक पर उनके व्यवहार की शिकायत कर रहे हैं । इनमें सबसे ज्यादा अनुचित संदेशों को
भेजने की शिकायतें है । संस्था ने पिछले साल के पाँच हजार तलाक के आवेदनों का अध्ययन
किया और पाया कि 33 प्रतिशत से अधिक तलाक आवेदन फेसबूक के कारण ही हुये हैं । वर्ष 2009
मे यह प्रतिशत 20 था ।
डेली मेल के से डाइवर्स ऑनलाइन के प्रवक्ता मार्क कैनन ने कहा
कि यदि किसी को फ़्लर्ट करना है तो फेसबूक सबसे ज्यादा आसान माध्यम है । अमेरिकन एकेडमी
ऑफ मेट्रोमोनियल लायर्स का कहना है कि 80 प्रतिशत वकीलों का भी मानना है कि शोषल नेटवर्किंग
के कारण तलाक के आवेदन बढ़े हैं ।
"फेसबूक एंड योर मैरिज" पुस्तक लिखने वाले के। जयसान
क्राफसकी का कहना है कि पहले सालों या कई महीनों मे पनपने वाले अफेयर अब सिर्फ कुछ
किलिक से संभाव हो गए हैं । अध्ययन मे यह भी पाया गया कि तलाकशुदा लोग भी अपने पूर्व
साथी के बारे मे टिप्पणियाँ कर रहे हैं ।
Labels:
फेसबूक
संयम- दो कविताये
1
चिक
मेरे शयनकक्ष में,रोज धूप आती थी सर्दी में सुहाती थी
गर्मी में सताती थी
अब मैंने एक चिक लगवाली है और धूप से मनचाही निज़ात पा ली है
समय के अनुरूप
वासना की धूप
जब मेरे संयम की चिक की दीवार से टकराती है
कभी हार जाती है
कभी जीत जाती है
२
तकिया
जिसको सिरहाने रख कर के,
मीठी नींद कभी आती थी
जिसको बाहों में भर कर के
,रात विरह की कट जाती थी
कोमल तन गुदगुदा रेशमी,
बाहुपाश में सुख देता था
जैसे चाहो,वैसे खेलो,
मौन सभी कुछ सह लेता था
वो तकिया भी ,साथ उमर के,
जो गुल था,अब खार बन गया
बीच हमारे और तुम्हारे,
संयम की दीवार बन गया
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
बुधवार, 23 मई 2012
गाँव का वो घर-वो गर्मी की छुट्टी
मुझे याद आता है,गाँव का वो घर,
वो गर्मी की रातें, वो बचपन सलोना
ठंडी सी छत पर,बिछा कर के बिस्तर,
खुली चांदनी में,पसर कर के सोना
ढले दिन और नीड़ों में लौटे परिंदे,
एक एक कर उन सारों को गिनना
पड़े रात तारे ,लगे जब निकलने,
तो नज़रे घुमा के, उन सारों को गिनना
भीगा बाल्टी में, भरे आम ठन्डे,
ले ले के चस्के, उन्हें चूसना फिर
एक दूसरे को पहाड़े सुनाना,
पहेली बताना, उन्हें बूझना फिर
जामुन के पेड़ो पे चढ़ कर के जामुन,
पकी ढूंढना और खाना मज़े से
करोंदे की झाड़ी से ,चुनना करोंदे,
पकी खिरनी चुन चुन के लाना मज़े से
अम्बुआ की डाली पे,कोयल की कूहू,
की करना नक़ल और चिल्ला के गाना
,कच्ची सी अमियायें ,पेड़ों पर चढ़ कर,
चटकारे ले ले के,मस्ती में खाना
चूल्हे में लकड़ी और कंडे जला कर,
गरम रोटियां जब खिलाती थी अम्मा
कभी लड्डू मठरी,कभी सेव पपड़ी,
कभी ठंडा शरबत पिलाती थी अम्मा
कभी चोकड़ी ताश की मिल ज़माना,
कभी सूनी सड़कों पे लट्टू घुमाना
भुलाये भी मुझको नहीं भूलती है,
वो गर्मी की छुट्टी, वो बचपन सुहाना
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Labels:
घोटू'
रविवार, 20 मई 2012
देश की कुंडली
एक तरफ तो भ्रष्ट सारी मंडली है
और दूजी तरफ भज भज मंडली है
क्या नहीं विकल्प कोई तीसरा है,
किस तरह की देश की ये कुंडली है
यहाँ पर सियार है,सारे रंगे है
लूटने में , देश को, मिल कर लगे है
कोई भी एसा नज़र आता नहीं है
लुटेरों से जिसका कुछ नाता नहीं है
किस तरह से पेट भर पाएगी जनता,
जो भी रोटी उठाते है,वो जली है
किस तरह की देश की ये कुंडली है
हर तरफ है,भ्रष्टता का बोलबाला
लक्ष्मी ,स्विस बेंक में ,मुंह करे काला
बढ़ रही मंहगाई अब सुरसा मुखी है
परेशां ,लाचार सी जनता दुखी है
कहाँ जाए,रास्ता दिखता नहीं है,
आज काँटों से भरी ,हर एक गली है
किस तरह की ,देश की ये कुंडली है
सह रहे क्यों,इस तरह,ये मार है हम
पंगु क्यों है,हुए क्यों लाचार है हम
क्यों हमारा खून ठंडा पड़ गया है
आत्म का सन्मान क्यों कर मर गया है
फूटना ज्वालामुखी का है सुनिश्चित,
लगी होने धरा में कुछ खलबली है
किस तरह की देश की ये कुंडली है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
और दूजी तरफ भज भज मंडली है
क्या नहीं विकल्प कोई तीसरा है,
किस तरह की देश की ये कुंडली है
यहाँ पर सियार है,सारे रंगे है
लूटने में , देश को, मिल कर लगे है
कोई भी एसा नज़र आता नहीं है
लुटेरों से जिसका कुछ नाता नहीं है
किस तरह से पेट भर पाएगी जनता,
जो भी रोटी उठाते है,वो जली है
किस तरह की देश की ये कुंडली है
हर तरफ है,भ्रष्टता का बोलबाला
लक्ष्मी ,स्विस बेंक में ,मुंह करे काला
बढ़ रही मंहगाई अब सुरसा मुखी है
परेशां ,लाचार सी जनता दुखी है
कहाँ जाए,रास्ता दिखता नहीं है,
आज काँटों से भरी ,हर एक गली है
किस तरह की ,देश की ये कुंडली है
सह रहे क्यों,इस तरह,ये मार है हम
पंगु क्यों है,हुए क्यों लाचार है हम
क्यों हमारा खून ठंडा पड़ गया है
आत्म का सन्मान क्यों कर मर गया है
फूटना ज्वालामुखी का है सुनिश्चित,
लगी होने धरा में कुछ खलबली है
किस तरह की देश की ये कुंडली है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
शनिवार, 19 मई 2012
सबसे बड़ा अजूबा
खुदा की खुदाई से,
खुदा के बन्दों ने,कुछ पत्थर खोद निकाले
और अपनी मृत काया को सुरक्षित रखने को,
विशालकाय पिरेमिड बना डाले
और ये पिरेमिड आज एक अजूबा है
अपनी संगेमरमर सी सुन्दर बेगम की याद में,
एक बादशाह ने,धरती की कोख से,निकले संगेमरमर
और लगा दिए कब्रगाह में,बना दिया ताजमहल
और ये ताजमहल आज एक अजूबा है
और चीन के शासकों ने,
सुरक्षित रखने को अपनी सीमायें
धरती के सीने से,कितने ही पत्थर खुदवाये
और बना डाली एक लम्बी चौड़ी दीवार
जिसे कोई भी न कर सके पार
ये चीन की दीवार भी आज एक अजूबा है
इसी तरह ब्राजील में,पहाड़ की चोंटी पर,
हाथ फैलाए क्राइस्ट का पुतला,
या जोर्डन में पेट्रा का महल,
रोम का कोलोसियम
या पेरू का माचु पिचु
ये सारे अजूबे बनाए है ,
भगवान के गढ़े एक अजूबे ने,
जिसे कहते है इंसान
और बनाए गए है,चीर कर सीना,
उस धरती माता का,
जो अपने आप में अजूबा है महान
जिसकी कोख में एक बीज डाला जाता है
तो हज़ारों दानो में बदल जाता है
जिसके सीने पर कई उत्तंग शिखर है
और तन पर लहराते कई समंदर है
तो आओ,पहले हम इन अजूबों को सराहें
पर उस सृष्टि कर्ता को नहीं भुलायें
जिसके इशारों पर रोज सूरज निकलता है
चाँद घटता और बढ़ता है
हवायें लहलहाती है
पुष्पों से खुशबू आती है
क्योंकि ये सृष्टि और वो सृष्टि कर्ता ,
जो सृष्टि का संचालन करता है ,
अपने आप में संसार का सबसे बड़ा अजूबा है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
दशक का चिट्ठाकार : हर एक ब्लॉगर जरूरी होता है ।
कल अचानक जाल भ्रमण के दौरान दिव्या जी की एक पोस्ट पर मेरी
नज़र पड़ी । उन्होने हर विषय पर बड़ी साफ़गोई के साथ अच्छी और सच्ची टिप्पणियाँ करके मेरा
मार्गदर्शन कर दिया । मैं हतप्रभ हूँ और उत्साहित भी इस सारगर्भित पोस्ट को
पढ़कर । उनकी कई बातें मुझे अमल करने योग्य लगी जिनमें से एक है “ सर्वप्रथम नामों की
एक सूची जारी करनी चाहिए । उसमें नामांकन ब्लॉगर द्वारा स्वयं होनी चाहिए । फिर उन
नामों पर अन्य ब्लोगर्स द्वारा वोटो के मिलने पर उसकी गणना होनी चाहिए । ब्लोगर्स से
यह अधिकार नहीं छिना जाना चाहिए कि वह अपना मत, अपने लिए इस्तेमाल कर सके
। कभी-कभी यही एक मत निर्णायक साबित होता है ।“
आपका आभार दिव्या जी, इस मार्गदर्शन के लिए ।
अब संभव नहीं कि जो चुनावी प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है, उसे बीच
मे रोक दिया जाये । यह भी संभव नहीं कि प्राप्त मतदानों पर विचार न किए जाये । वो तो
निर्वाद्ध चलती रहेगी और उसपर निर्णय भी पूर्व के नियम और शर्तों के आधार पर ही होगा, किन्तु उसमें एक संशोधन यह किया जा रहा कि कोई भी ब्लॉगर अपने लिए मत का इस्तेमाल
कर सकता है। जहां तक पारदर्शिता का सवाल है तो अंतिम निर्णय के पश्चात जिन्हें भी आपत्ति
होगी उन्हें आवश्यकतानुसार प्राप्त मतदान की सूची भेजी जाएगी या फिर सार्वजनिक कर दी
जाएगी ।
हाँ सामूहिक हित में एक कार्य अवश्य किया जा सकता है -उपरोकतानुसार पाँच ब्लॉग
और पाँच ब्लॉगर के चयन के पश्चात अभी भी परिकल्पना सम्मान के अंतर्गत हमें 41 ब्लोगर्स
का चयन करना है, जसमें आप हमें टिप्पणी के माध्यम से सुझाव दे सकते हैं कि किस
श्रेणी मे किस ब्लॉगर का चयन किया जाये ?
(1) कवि का सम्मान
(2) युवा कवि का सम्मान
(3) कवयित्रि का सम्मान
(4) युवा कवयित्रि का सम्मान
(5)व्यंग्यकार का सम्मान
(6)
युवा व्यंग्यकार का सम्मान
(7)
कार्टूनिस्ट का सम्मान
(8)
युवा कार्टूनिस्ट का सम्मान
(9)
लेखक का सम्मान (कथा-कहानी)
(10)
लेखक का सम्मान (संस्मरण )
(11)
लेखक का सम्मान (यात्रा वृतांत)
(12)
लेखक का सम्मान (सकारात्मक पोस्ट)
(13)
लेखक का सम्मान (परिचर्चा)
(14)
लेखिका का सम्मान (कथा-कहानी)
(15)
लेखिका का सम्मान (संस्मरण)
(16)
लेखिका का सम्मान (यात्रा वृतांत)
(17)
लेखिका का सम्मान (सकारात्मक पोस्ट)
(18)
लेखिका का सम्मान (परिचर्चा)
(19)
तकनीकी ब्लॉगर का सम्मान
(20)
युवा तकनीकी ब्लॉगर का सम्मान
(21)
नवोदित ब्लॉगर का सम्मान
(22)
उदीयमान ब्लॉगर का सम्मान
(23)
ब्लॉग विचारक का सम्मान
(24)
गीतकार का सम्मान
(25)
युवा गीतकार का सम्मान
(26)
गजलकार का सम्मान
(27)
युवा ग़ज़लकर का सम्मान
(28)
टिप्पणीकार का सम्मान ( पुरुष)
(29)
टिप्पणीकार का सम्मान (महिला)
(30)
हिन्दी प्रचारक का सम्मान (पुरुष)
(31)
हिन्दी प्रचारक का सम्मान (महिला)
(32)
चित्रकार का सम्मान (पुरुष)
(33)
चित्रकार का सम्मान (महिला)
(34)
छायाकार का सम्मान (पुरुष)
(35)
छायाकार का सम्मान (महिला)
(36)
यशस्वी ब्लॉगर का सम्मान
(37)
आदर्श ब्लॉगर का सम्मान
(38)
बाल ब्लॉगर का सम्मान
(39)
ब्लॉग समीक्षक का सम्मान
(40) ब्लॉग फिल्म समीक्षक का सम्मान
(41) विज्ञान कथा लेखक का सम्मान
ध्यान दें : केवल 24 घंटे के भीतर प्राप्त आपके सकारात्मक सुझाव का ही सम्मान किया जाएगा, विवाद पैदा करने वाली टिप्पणियों को महत्व नहीं दिया जाएगा ।
दशक के हिंदी चिट्ठाकार और दशक का हिंदी चिट्ठा के चुनाव हेतु :
|
|---|
Labels:
दशक का चिट्ठाकार
हिन्दी गीत - मौत की आहट ।
=================
प्यारे दोस्तों,
मैं आज भी संगीत जगत में एक शिष्य ही हूँ, अतः बड़े ही विनम्र भाव से, मैं मेरी एक गज़लनुमा गीत-रचना,मेरे ही स्वरांकन-संगीतबद्ध करके पेश कर रहा हूँ । गीतकार-स्वरांकन-संगीत-गायक-मार्कंड दवे ।
स्वरायोजन-प्रसुन चौधरी.
=================
मौत की आहट (गज़लनुमा गीत)
=================
मौत की आहट (गज़लनुमा गीत)
=================
हर साँस मे मौत की आहट सुनाई देती है ।
ज़िंदगी अब तो गिन-गिन के बदला लेती है ।
ज़िंदगी अब तो गिन-गिन के बदला लेती है ।
१.
ज़िंदगी जीने मे जो माहिर माने जाते थे ।
उनको अब जीने की रीत देखो सिखाई जाती है ।
हर साँस मे ...................
ज़िंदगी जीने मे जो माहिर माने जाते थे ।
उनको अब जीने की रीत देखो सिखाई जाती है ।
हर साँस मे ...................
२.
बेआबरु न हो कोई, मैं तो खामोश रहता था ।
कहानी मेरी ही अब मुझ को सुनाई जाती है ।
हर साँस मे ...................
बेआबरु न हो कोई, मैं तो खामोश रहता था ।
कहानी मेरी ही अब मुझ को सुनाई जाती है ।
हर साँस मे ...................
३.
मुआफ़ करना गुस्ताख़ी अगर हो कोई ।
आखरी ख़्वाहिश सभी से तो पूछी जाती है ।
हर साँस मे ...................
मार्कड दवे । मई -२३.२००९.
मुआफ़ करना गुस्ताख़ी अगर हो कोई ।
आखरी ख़्वाहिश सभी से तो पूछी जाती है ।
हर साँस मे ...................
मार्कड दवे । मई -२३.२००९.
बृहस्पतिवार, 17 मई 2012
रुझान : 96 घंटे बाद .....दशक के हिंदी चिट्ठाकार ?
____________
दशक के
हिंदी चिट्ठाकार
____________
(1) समीर लाल समीर
(2) रवि रतलामी
(3) अनूप शुक्ल
(4) रंजना रंजू भाटिया
(5) दिनेश राय द्विवेदी
(6) बी. एस. पावला
(7) कविता वाचक्नवी
(8) शास्त्री जे सी फिलिप
(9) पूर्णिमा वर्मन
(10) सतीश सक्सेना
दृष्टव्य : इसके अलावा अविनाश वाचस्पति, रश्मि प्रभा , अरविन्द मिश्र और
ज्ञान दत्त पाण्डेय भी 96 घंटे की रुझान में क्रमश: ग्यारहवें से पन्द्रहवें स्थान पर हैं .
____________
दशक का
हिंदी चिट्ठा
____________
(1) उड़न तश्तरी
(2) भड़ास
(3) ब्लॉग स इन मिडिया
(4) साई ब्लॉग
(5) अजदक
(6) फ़ुरसतिया
(7) साइंस ब्लोगर असोसिएशन
(8) छींटे और बौछारें
(9) तीसरा खंबा
(10) नुक्कड़
दृष्टव्य : इसके अलावा मोहल्ला, नारी, मेरी भावनाएं, शब्दावली और गत्यात्मक ज्योतिष भी 96 घंटे की रुझान में क्रमश: ग्यारहवें से पन्द्रहवें स्थान पर हैं .
____________
विगत 48 घंटों की रुझान के पश्चात मतदाताओं ने कुछ और नए नाम जोड़े हैं जैसे जाकिर अली रजनीश, अविनाश दास, अजित वडनेरकर, हंस राज सुज्ञ , सुरेश चिपलूनकर और कुमार राधारमण ...!
पेंडो
से पहले उदासी तो लीजिये ।।
चीजें जो मैंने अपने जीवन मे सीखी, उसमे से एक यह भी है कि आप किसी को बाध्य नहीं कर सकते
कि वह आपकी किसी सोच का समर्थन करे । आप केवल अपील कर सकते हैं या फिर उन्हें प्रेरित
कर सकते हैं या फिर विश्वास दे सकते हैं कि वह आपके सच्चे कार्यों का समर्थन करे। बाकी
सब उनके विवेक पर छोड़ दें ।
चीजें जो मैंने अपने जीवन मे सीखी, उसमे से एक यह भी है कि जो आपके वश मे नहीं है उसको महत्व
न दें, परंतु जो आपके वश मे है उसे निरर्थक न जाने दें । क्योंकि
आप झटके मे कुछ ऐसा कर बैठते हैं जो हमेशा-हमेशा के लिए आपके दिल का दर्द बन जाता है
।
मैंने यह भी सीखा है कि चाहे साहित्य हो या ब्लोगिंग, कुछ तो लोग
कहेंगे ही.....। रोजमर्रा के जीवन में जैसे हम कुछ चीजों की अनदेखी करते हैं,यहाँ भी आवश्यकतानुसार अनदेखी करते हुए अपने कर्मों को महत्व दिया जाए । क्योंकि बहुत आसान होता है अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना जबकि सोचना उतना महत्व नहीं रखता ।
चीजें जो मैंने अपने जीवन मे सीखी, उसमे से एक यह भी है कि ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो आपको चाहते हैं,आपकी परवाह करते हैं, पर वे तय नहीं कर पाते कि अपनी चाहत को कैसे प्रदर्शित करें ? ऐसे मित्रों की पहचान भावनाओं के बल पर करें न कि प्रेक्टिकल होकर । आपके दो शब्द उसके दर्द को कम कर सकता है।
मैंने यह भी सीखा है कि जब आपका मित्र आपकी मदद चाहता है, तब आप अपने को शक्तिशाली समझें और उपयोगी भी। मैंने यह भी सिखा है कि आपका जीवन कुछ घंटों में बदल सकता है उन व्यक्तियों के द्वारा जिन्हें आप जानते भी नहीं ।
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं सकारात्मक और नकारात्मक। एक नकारात्मक पहलू यह भी है : उसकी कमीज मेरे कमीज से सफ़ेद क्यों—आज का समाज इसी थीम पर चल रहा है । विज्ञापन मे गंदी कमीज को उजला करने का रास्ता बताया जाता है । राजनीति मे साफ कमीज को गंदा करने के रास्ते तलाशे जाते हैं । राजनीति जब किसी सभ्य समाज पर हावी हो जाती है तो उस समाज से उजली कमीजों की तादाद लगातार कम होने लगती है । तपेदिक हो जाता है सच को । परिकल्पनाएं लूली-लंगड़ी हो जाती है और मर्यादाएं रोज लांघने लगती है लक्ष्मण रेखा ।
किन्तु इससे अलग जो व्यक्ति अपने और समाज के प्रति ईमानदार है वह केवल और केवल आगे की सोचता है । आप भी आगे की सोचिये और दशक के हिंदी ब्लोगर और ब्लोग्स के चुनाव में अपना महत्वपूर्ण मत अवश्य दीजिये।
इसी पोस्ट में नीचे लिंक भी निहित है । कोई वन्दिश नहीं है कि आप किसको वोट करेंगे । आपका अंतर्मन जिसे भी वोट करने को कहे उसको कर दें । वोट करना बहुत आसान है . प्रपत्र मे दो प्रश्न है एक है दशक का ब्लॉगर ? और दूसरा है दशक का ब्लॉग? उसके नीचे विकल्प दिये गए हैं, हर नाम के पहले एक गोला है जिसमे आपको किलिक करना है ....यदि उस विकल्प से आप सहमत नहीं हैं तो अदर मे अपनी पसंद के किसी और ब्लॉग अथवा ब्लॉगर का नाम अंकित करते हुये सबसे नीचे सबमिट का बटन बना है उसपर किलिक कर दें ....हो गया आपका वोट पूर्ण ।
चीजें जो मैंने अपने जीवन मे सीखी, उसमे से एक यह भी है कि ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो आपको चाहते हैं,आपकी परवाह करते हैं, पर वे तय नहीं कर पाते कि अपनी चाहत को कैसे प्रदर्शित करें ? ऐसे मित्रों की पहचान भावनाओं के बल पर करें न कि प्रेक्टिकल होकर । आपके दो शब्द उसके दर्द को कम कर सकता है।
मैंने यह भी सीखा है कि जब आपका मित्र आपकी मदद चाहता है, तब आप अपने को शक्तिशाली समझें और उपयोगी भी। मैंने यह भी सिखा है कि आपका जीवन कुछ घंटों में बदल सकता है उन व्यक्तियों के द्वारा जिन्हें आप जानते भी नहीं ।
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं सकारात्मक और नकारात्मक। एक नकारात्मक पहलू यह भी है : उसकी कमीज मेरे कमीज से सफ़ेद क्यों—आज का समाज इसी थीम पर चल रहा है । विज्ञापन मे गंदी कमीज को उजला करने का रास्ता बताया जाता है । राजनीति मे साफ कमीज को गंदा करने के रास्ते तलाशे जाते हैं । राजनीति जब किसी सभ्य समाज पर हावी हो जाती है तो उस समाज से उजली कमीजों की तादाद लगातार कम होने लगती है । तपेदिक हो जाता है सच को । परिकल्पनाएं लूली-लंगड़ी हो जाती है और मर्यादाएं रोज लांघने लगती है लक्ष्मण रेखा ।
किन्तु इससे अलग जो व्यक्ति अपने और समाज के प्रति ईमानदार है वह केवल और केवल आगे की सोचता है । आप भी आगे की सोचिये और दशक के हिंदी ब्लोगर और ब्लोग्स के चुनाव में अपना महत्वपूर्ण मत अवश्य दीजिये।
इसी पोस्ट में नीचे लिंक भी निहित है । कोई वन्दिश नहीं है कि आप किसको वोट करेंगे । आपका अंतर्मन जिसे भी वोट करने को कहे उसको कर दें । वोट करना बहुत आसान है . प्रपत्र मे दो प्रश्न है एक है दशक का ब्लॉगर ? और दूसरा है दशक का ब्लॉग? उसके नीचे विकल्प दिये गए हैं, हर नाम के पहले एक गोला है जिसमे आपको किलिक करना है ....यदि उस विकल्प से आप सहमत नहीं हैं तो अदर मे अपनी पसंद के किसी और ब्लॉग अथवा ब्लॉगर का नाम अंकित करते हुये सबसे नीचे सबमिट का बटन बना है उसपर किलिक कर दें ....हो गया आपका वोट पूर्ण ।
Labels:
दशक के हिंदी चिट्ठाकार

नई दिल्ली से सुषमा सिंह की एक विस्तृत रपट रविवार दिनांक 8 मई 2011 के दैनिक जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ में पेज 19 पर प्रकाशित।






































